यूएन में बोला भारत- बच्चों की शिक्षा सुरक्षित करना दान नहीं, वैश्विक कर्तव्य

यूएन में बोला भारत- बच्चों की शिक्षा सुरक्षित करना दान नहीं, वैश्विक कर्तव्य 

न्यूयॉर्क - सशस्त्र संघर्षों के बीच बच्चों की शिक्षा की सुरक्षा को लेकर भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में दुनिया को उसकी सामूहिक जिम्मेदारी का अहसास कराया है। यूएनएससी की वार्षिक खुली बहस 'बच्चों और सशस्त्र संघर्ष' में भाग लेते हुए संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पी. हरीश ने दोटूक कहा कि युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करना कोई खैरात या दान नहीं, बल्कि एक अनिवार्य अंतरराष्ट्रीय कर्तव्य है।

न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में भारत के स्थायी मिशन ने एक बयान जारी कर हरीश के इस संबोधन की जानकारी दी। भारतीय मिशन ने बताया कि कोलंबिया की अध्यक्षता में आयोजित इस विशेष चर्चा के दौरान भारत ने स्कूलों और बच्चों को निशाना बनाने वाले देशों और संगठनों की जवाबदेही तय करने की मांग की। इस दौरान राजदूत हरीश ने कहा जवाबदेही के बिना बच्चों की सुरक्षा अधूरी है। जो लोग बिना किसी डर के स्कूलों और बच्चों को निशाना बनाते हैं, उन्हें सजा मिलनी ही चाहिए।

महासचिव की वार्षिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए भारतीय राजदूत ने बताया कि संघर्ष वाले क्षेत्रों में स्कूलों पर होने वाले हमलों में महज एक वर्ष (2025) के भीतर 44 प्रतिशत की चौंकाने वाली बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उन्होंने बच्चों की इस दयनीय स्थिति को "मानवता की सामूहिक विफलता का एक पुख्ता प्रमाण" करार दिया। उन्होंने जोर देकर कहा कि स्कूल केवल सीखने का स्थान नहीं हैं, बल्कि वे बच्चों के संज्ञानात्मक, भावनात्मक और सामाजिक विकास की नींव होते हैं। किसी बच्चे की शिक्षा की रक्षा करना, असल में एक देश के भविष्य की रक्षा करना है।

बहस के दौरान पी. हरीश ने बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए भारत की अटूट प्रतिबद्धता को दोहराया। उन्होंने भारत के संवैधानिक प्रावधानों का उल्लेख किया जो 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देते हैं। इसके साथ ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत द्वारा किए गए कार्यों का विवरण भी प्रस्तुत किया।

भारतीय राजनयिक ने बताया कि भारत ने पड़ोसी देशों सहित कई संकटग्रस्त राष्ट्रों में स्कूलों और व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों के पुनर्निर्माण में भारी निवेश किया है। साथ ही युद्ध और आपदाओं के कारण विस्थापित हुए समुदायों और शरणार्थी बच्चों की निरंतर शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए भी भारत लगातार काम कर रहा है। भारत ने अपने राष्ट्रीय डिजिटल शिक्षा प्लेटफॉर्म 'दीक्षा' का उदाहरण पेश करते हुए बताया कि कैसे आधुनिक तकनीक के जरिए उन बच्चों तक शिक्षा पहुंचाई जा सकती है, जो युद्ध के कारण क्लासरूम से दूर हो चुके हैं।


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