कचरे से कमाल: राजगढ़ में प्लास्टिक की बोतलों से बन रहा ‘I Love ब्यावरा’, अब शहर होगा पॉलीथिन मुक्त! Aajtak24 News

कचरे से कमाल: राजगढ़ में प्लास्टिक की बोतलों से बन रहा ‘I Love ब्यावरा’, अब शहर होगा पॉलीथिन मुक्त! Aajtak24 News

राजगढ़ - जिले में स्वच्छ भारत मिशन के तहत एक ऐसी अनोखी पहल सामने आई है, जिसने कचरे को समस्या नहीं बल्कि संसाधन में बदलने का रास्ता दिखाया है। नगर पालिका परिषद ब्यावरा और नगर परिषद सुठालिया के सहयोग से पर्यावरण प्रेमी संरक्षण समिति प्लास्टिक और अनुपयोगी सामग्री को रिसायकल कर उपयोगी वस्तुओं में बदल रही है। समिति द्वारा घरों, दुकानों, स्कूलों, होटलों और रेस्टोरेंट्स से प्लास्टिक, पॉलीथिन, कपड़े और पानी की खाली बोतलें एकत्र कर उनसे ट्री गार्ड, डस्टबीन, टेबल, कुर्सियां, पेपर स्टैंड और इको ब्रिक्स जैसी उपयोगी सामग्री तैयार की जा रही है। इस अभियान ने शहर में पर्यावरण संरक्षण को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है।

पर्यावरण प्रेमी संरक्षण समिति अब तक 730 इको ब्रिक्स तैयार कर चुकी है। इन इको ब्रिक्स का उपयोग ब्यावरा नगर के सौंदर्यीकरण में किया जा रहा है। खास बात यह है कि इन्हीं ईंटों से “I Love ब्यावरा” का आकर्षक स्ट्रक्चर तैयार किया गया है, जो लोगों के आकर्षण का केंद्र बन रहा है। इसके अलावा पेड़ों की क्यारियों और बैठने के लिए मुड्डों का निर्माण भी इको ब्रिक्स से किया गया है। शहर में प्लास्टिक कचरे के बेहतर प्रबंधन के लिए समिति द्वारा नगर पालिका के सहयोग से 11 बोतल बैंक और 2 पॉलीथिन बैंक डस्टबीन भी लगाए गए हैं। इसके जरिए लोगों को प्लास्टिक अलग से जमा करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन बनाने के उद्देश्य से “छोटी पहल, बड़ा परिवर्तन” अभियान भी चलाया गया, जिसके तहत नागरिकों को प्लास्टिक मुक्त शहर बनाने के लिए जागरूक किया गया। समिति अब जल्द ही एक निशुल्क बर्तन बैंक शुरू करने जा रही है, ताकि आयोजनों में डिस्पोजल और प्लास्टिक के उपयोग को कम किया जा सके। कलेक्टर डॉ. गिरीश कुमार मिश्रा ने इस पहल को गंभीरता से लेते हुए मुख्य नगर पालिका अधिकारी ब्यावरा और नगर परिषद सुठालिया को निर्देश दिए हैं कि दोनों निकायों में प्लास्टिक वेस्ट का पृथक्कीकरण कर समिति को उपलब्ध कराया जाए। उनका कहना है कि यदि प्लास्टिक कचरे का सही प्रबंधन हुआ तो शहरों को पॉलीथिन मुक्त बनाने में बड़ी सफलता मिल सकती है।

कलेक्टर ने यह भी कहा कि पॉलीथिन के कारण नालियां जाम होती हैं, भूमि की उर्वरक क्षमता प्रभावित होती है और गौवंश की मौत तक हो जाती है। ऐसे में यह अभियान केवल स्वच्छता नहीं बल्कि पर्यावरण और पशु संरक्षण से भी जुड़ा हुआ है। राजगढ़ में शुरू हुई यह पहल अब दूसरे शहरों के लिए भी एक मॉडल बनती दिखाई दे रही है, जहां कचरे को बोझ नहीं बल्कि उपयोगी संसाधन मानकर उससे विकास और स्वच्छता दोनों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल

  1. यदि प्लास्टिक कचरे से इतनी उपयोगी सामग्री बनाई जा सकती है, तो अब तक नगर निकायों ने इसे बड़े स्तर पर लागू क्यों नहीं किया? क्या वर्षों से प्लास्टिक प्रबंधन सिर्फ कागजों तक सीमित था?
  2. नगर में 11 बोतल बैंक और 2 पॉलीथिन बैंक लगाए गए हैं, लेकिन क्या इनके नियमित उपयोग और मॉनिटरिंग के लिए कोई ठोस व्यवस्था भी बनाई गई है या यह पहल सिर्फ दिखावे तक सीमित रह जाएगी?
  3. कलेक्टर ने पॉलीथिन से गौवंश की मौत और नालियों के जाम होने की बात कही, तो सवाल यह है कि खुलेआम पॉलीथिन उपयोग करने वालों और प्रतिबंध के बावजूद बिक्री करने वालों पर अब तक कितनी कार्रवाई हुई?

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