गौरेला-पेंड्रा; खेत से बाजार तक महिलाओं का कमाल: ‘विष्णु भोग’ चावल बना गांव की नई पहचान

गौरेला-पेंड्रा; खेत से बाजार तक महिलाओं का कमाल: ‘विष्णु भोग’ चावल बना गांव की नई पहचान

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही - राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत संचालित ‘अरपा बिहान’ अभियान के जरिए अब स्थानीय पारंपरिक उत्पाद “विष्णु भोग” चावल को नई पहचान दिलाने की कोशिश की जा रही है। स्व-सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं इस विशेष चावल के उत्पादन और विपणन का कार्य संभाल रही हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने के साथ महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता भी बढ़ रही है। सुशासन तिहार के तहत आमडोब में आयोजित जनसमस्या निवारण शिविर में प्रणव कुमार मरपच्ची ने समूह की महिलाओं के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देना ग्रामीण विकास की मजबूत नींव बन सकता है। उन्होंने कहा कि महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से गांवों में रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर तैयार हो रहे हैं और इससे आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल मिल रहा है।

संतोष कुमार देवांगन और मुकेश रावटे ने भी ‘अरपा बिहान’ की गतिविधियों की प्रशंसा करते हुए कहा कि स्व-सहायता समूहों के जरिए महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। अधिकारियों ने महिलाओं को गुणवत्तायुक्त उत्पादन, पैकेजिंग और बेहतर विपणन व्यवस्था विकसित करने के लिए प्रेरित किया। कार्यक्रम में “विष्णु भोग” चावल की विशेषताओं और उसके उत्पादन की जानकारी भी साझा की गई। ग्रामीणों को बताया गया कि यह पारंपरिक चावल स्थानीय कृषि संस्कृति से जुड़ा हुआ है और इसकी बाजार में अच्छी मांग तैयार की जा सकती है। कार्यक्रम में एनआरएलएम स्टाफ, स्व-सहायता समूह की महिलाएं और कई जनप्रतिनिधि मौजूद रहे।

ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि पहले स्थानीय उत्पाद केवल गांव तक सीमित रह जाते थे, लेकिन अब प्रशासनिक सहयोग और योजनाओं के जरिए उन्हें बाजार तक पहुंचाने का अवसर मिल रहा है। इससे महिलाओं की आय बढ़ने के साथ गांवों में स्वरोजगार की संभावनाएं भी मजबूत हो रही हैं।

आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल

  1. ‘विष्णु भोग’ चावल को बढ़ावा देने की बात हो रही है, लेकिन क्या सरकार ने इसके लिए स्थायी बाजार, ब्रांडिंग और न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी कोई ठोस व्यवस्था बनाई है?
  2. स्व-सहायता समूहों की महिलाओं को उत्पादन तो कराया जा रहा है, लेकिन क्या उन्हें प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और ऑनलाइन मार्केटिंग का पर्याप्त प्रशिक्षण भी दिया गया है?
  3. स्थानीय उत्पादों को आत्मनिर्भरता का मॉडल बताया जा रहा है, तो अब तक इन समूहों की औसत आय में वास्तविक रूप से कितना बढ़ोतरी हुई है और क्या उसका कोई सार्वजनिक डेटा उपलब्ध है?

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