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| 'मुफ्त' का मोह या भविष्य का विनाश? लोकतंत्र में 'रेवड़ी' संस्कृति और अर्थव्यवस्था के बीच छिड़ी जंग Aajtak24 News |
टैक्सपेयर की जेब पर डाका और बुनियादी ढांचे की बलि
विडंबना देखिए, राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए घोषणाएं तो बढ़-चढ़कर करते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद जब इन योजनाओं को लागू करने की बारी आती है, तो पैसा दल के कोष से नहीं बल्कि आम जनता की गाढ़ी कमाई (Tax) से जाता है। यह जनता के पैसे का जनता के ही भविष्य के खिलाफ इस्तेमाल है।
जब बजट का बड़ा हिस्सा 'रेवड़ियां' बांटने में खर्च हो जाता है, तो सीधा असर बुनियादी ढांचे पर पड़ता है। एक तरफ सरकारी स्कूलों में छतों से पानी टपकता है, अस्पतालों में वेंटिलेटर और डॉक्टरों की कमी रहती है, और सड़कें पहली ही बारिश में बह जाती हैं, वहीं दूसरी तरफ चुनाव जीतने के लिए खजाना खाली कर दिया जाता है। क्या हम वाकई विकास कर रहे हैं या कर्ज के बोझ तले दबे एक ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं जो पूरी तरह सरकार की बैसाखियों पर टिका हो?
सिद्धांतहीन राजनीति और बाहुबल का वर्चस्व
आज राजनीतिक दलों में निष्ठा और नैतिकता के लिए कोई स्थान शेष नहीं बचा है। ईमानदारी से काम करने वाले जमीनी कार्यकर्ताओं के बजाय उन चेहरों को तरजीह दी जा रही है जो धनबल और बाहुबल में संपन्न हैं। गंभीर आरोपों से घिरे अपराधी और अकूत संपत्ति के मालिक आज राजनीतिक दलों के 'चाणक्य' बने बैठे हैं।
मंचों से 'माता-बहनों' और 'युवाओं' को संबोधित करने वाले नेताओं के लच्छेदार भाषणों के पीछे की कड़वी सच्चाई यह है कि धरातल पर भ्रष्टाचार का एक संगठित जाल बिछा हुआ है। जब नेतृत्व ही सिद्धांतों के बजाय 'जीत' को प्राथमिकता देने लगे, तो नैतिकता की उम्मीद करना बेमानी है।
योजनाएं बनाम हकीकत: भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता कल्याण
लाडली बहना, किसान सम्मान निधि, आवास योजना और जल संवर्धन जैसी तमाम योजनाएं सुनने में अत्यंत जनकल्याणकारी लगती हैं, लेकिन इनकी जमीनी हकीकत 'सिस्टम' के भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है। रीवा और मऊगंज जैसे क्षेत्रों में जब योजना की निगरानी करने वाले अधिकारियों और बिचौलियों का ही 'कमीशन' फिक्स हो, तो आम आदमी तक विकास का असली लाभ कैसे पहुँचेगा? क्या ₹1,000 की मदद देकर लाखों के भ्रष्टाचार पर पर्दा डाला जा सकता है?
न्यायालय और जनता की भूमिका
अब समय आ गया है कि न्यायपालिका इस पर स्वतः संज्ञान ले। क्या यह संभव नहीं कि चुनावी घोषणाओं का खर्च संबंधित दल के अपने कोष से लिया जाए? यदि जनता के टैक्स का पैसा केवल वोटों की खरीद-फरोख्त और लोकलुभावन वादों में खर्च होगा, तो भविष्य की पीढ़ियों के लिए हम केवल कर्ज का अंबार छोड़कर जाएंगे।
निष्कर्ष: फैसला आपके हाथ में
अंततः, निर्णय जनता के हाथ में है। मतदाताओं को यह समझना होगा कि जो दल उन्हें 'मुफ्त' का लालच दे रहे हैं, वे असल में उनके बच्चों के भविष्य की कीमत पर अपनी सत्ता सुरक्षित कर रहे हैं। क्या हमें वास्तविक रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सुदृढ़ स्वास्थ्य सेवाएं चाहिए या केवल पांच साल में एक बार मिलने वाले चुनावी उपहार? यह सवाल आज भारत के हर नागरिक को अपने आप से पूछना होगा।
