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| रीवा-मऊगंज: राशन माफियाओं का 'सफेद' खेल; अपात्रों की मौज और गरीबों के हक पर डाका Aajtak24 News |
रीवा/मऊगंज - गरीबों को मिलने वाला सरकारी राशन आज भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है। रीवा और नवनिर्मित जिला मऊगंज में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है। सरकारी गोदामों से राशन कार्डधारकों की थाली तक पहुँचने वाला अनाज रास्ते में ही 'बिचौलियों' के माध्यम से ऊंचे दामों पर बाजार में बेचा जा रहा है। आलम यह है कि जो राशन गरीबों के लिए संजीवनी होना चाहिए था, वह अब सिंडिकेट के लिए कमाई का जरिया बन गया है।
1. सत्यापन की पोल: 70% अपात्रों के हाथ में 'सफेद' और 'पीला' कार्ड
नियमों के अनुसार चार पहिया वाहन, पक्का मकान और एक निश्चित आय सीमा से अधिक संपत्ति रखने वाले व्यक्ति इस योजना के पात्र नहीं हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इसके विपरीत है। कथित तौर पर जिले में 70% लोग उन मापदंडों के विपरीत हैं, फिर भी उन्हें 'निशुल्क राशन' मिल रहा है। यह सीधे तौर पर स्थानीय पटवारी और तहसीलदार द्वारा किए गए सत्यापन (Verification) पर सवाल खड़े करता है। जब संपन्न लोग मुफ्त का अनाज डकार रहे हैं, तो वास्तविक जरूरतमंद आज भी कतार में अंतिम स्थान पर खड़ा है।
2. ई-पॉस (e-POS) का खेल: पहले अंगूठा, फिर राशन का इंतज़ार
राशन दुकानों पर 'डिजिटल डाका' डाला जा रहा है। सेल्समैन और बिचौलियों ने नया तरीका निकाला है—हितग्राही का अंगूठा ई-पॉस मशीन पर पहले लगवा लिया जाता है, लेकिन राशन तुरंत नहीं दिया जाता। रिकॉर्ड में वितरण 100% दिखने के बाद, बचा हुआ स्टॉक रात के अंधेरे में निजी व्यापारियों को बेच दिया जाता है। ₹50-60 प्रति किलो की लागत वाला सरकारी अनाज ₹22-25 में बिचौलियों के माध्यम से खुले बाजार में खपाया जा रहा है।
3. 'रेट कार्ड' पर बन रहे राशन कार्ड: 1 से 5 हजार की वसूली
मऊगंज और रीवा में राशन कार्ड बनवाना अब सेवा नहीं, बल्कि 'सौदा' बन गया है। दलाल और बिचौलिए ₹1,000 से लेकर ₹5,000 तक का रेट कार्ड चला रहे हैं। जो पैसे दे रहा है, उसका कार्ड बिना किसी वेरिफिकेशन के बन जाता है, जबकि पात्र गरीब दफ्तरों के चक्कर काटकर थक चुका है। यह एक संगठित अपराध है, जिसमें स्थानीय प्रशासन के कुछ निचले स्तर के कर्मचारी भी शामिल बताए जा रहे हैं।
प्रशासनिक मौन पर सवाल
जब भ्रष्टाचार के इतने सबूत सामने हों, तब भी प्रशासन का मौन रहना संदेहास्पद है। 'ग्राउंड वेरिफिकेशन' की प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव ही बिचौलियों को ताकत दे रहा है। यदि समय रहते कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो सरकारी धन की यह बर्बादी और गरीबों के हक की यह लूट इसी तरह जारी रहेगी।
