| रीवा का प्रशासनिक 'महाभारत': क्या 'सफेदपोश' तंत्र डिगा पाएगा कलेक्टर सूर्यवंशी के संवैधानिक कदम? Aajtak24 News |
रीवा - विंध्य की राजनीति और प्रशासन के केंद्र रीवा में इन दिनों एक अभूतपूर्व 'शीत युद्ध' छिड़ा हुआ है। यह संघर्ष किसी राजनैतिक दल के बीच नहीं, बल्कि जिले के मुखिया और बरसों से दफ्तरों में जड़ जमाए बैठे उस 'सफेदपोश' कर्मचारी तंत्र के बीच है, जो व्यवस्था को अपनी जागीर मान चुका था। नवागत कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी की कार्यशैली ने रीवा के प्रशासनिक गलियारों में वह हलचल पैदा कर दी है, जिसकी कल्पना शायद उन कर्मचारियों ने नहीं की थी जो अब तक 'मेज के नीचे' के खेल में माहिर थे।
दफ्तरों में जमी 'धूल' और जागीरदारी का अंत
कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी ने कार्यभार संभालते ही अपनी प्राथमिकताएं स्पष्ट कर दी थीं। उन्होंने न केवल फाइलों की धूल झाड़ी, बल्कि उन चेहरों को भी बेनकाब करना शुरू कर दिया जो राजनैतिक रसूख की आड़ में जनता के कामों को रोक कर बैठे थे। रीवा के राजस्व, पंचायत, शिक्षा और महिला बाल विकास जैसे महत्वपूर्ण विभागों में सालों से एक ही टेबिल पर जमे कर्मचारियों के लिए अब 'वर्क कल्चर' का मतलब बदल गया है। सूत्र बताते हैं कि अब फाइलें 'निजी स्वार्थ' के बजाय 'जनहित' के आधार पर आगे बढ़ रही हैं, जिससे भ्रष्ट तंत्र की चूलें हिल गई हैं।
गृह जिला और राजनैतिक संरक्षण की ढाल
रीवा की प्रशासनिक व्यवस्था में सबसे बड़ी बाधा वे कर्मचारी रहे हैं जिनका यह गृह जिला है या जिन्हें स्थानीय राजनेताओं का वरदहस्त प्राप्त है। ऐसे कर्मचारी खुद को स्थानांतरण और कार्रवाई से ऊपर मानते आए हैं। लेकिन कलेक्टर की 'जीरो टॉलरेंस' नीति ने इस सुरक्षा कवच को भेद दिया है। समय पर दफ्तर पहुंचना, फील्ड विजिट करना और लंबित प्रकरणों का त्वरित निराकरण करना अब मजबूरी बन गया है। यही कारण है कि जो कर्मचारी अब तक 'रसूख' की मलाई खा रहे थे, वे अब कलेक्टर की सख्ती को 'प्रताड़ना' का नाम देकर संभागायुक्त के पास गुहार लगा रहे हैं।
त्रिकोणीय संघर्ष: कौन पड़ेगा भारी?
वर्तमान में रीवा में सत्ता के तीन केंद्र आपस में टकरा रहे हैं:
जिला कलेक्टर: जो संविधान की शपथ और जनता के प्रति जवाबदेही के साथ अडिग खड़े हैं।
कर्मचारी तंत्र: जो काम से बचने के लिए ज्ञापन की राजनीति और लामबंदी का सहारा ले रहा है।
जागरूक जनता: जो अब तक इन 'सफेदपोशों' की मनमानी सहती आई थी, लेकिन अब कलेक्टर के समर्थन में मुख्यमंत्री तक को पत्र लिख रही है।
सवालों के घेरे में कर्मचारी आक्रोश
सवाल यह उठता है कि क्या समय पर दफ्तर आना और जनता का काम ईमानदारी से करना 'प्रताड़ना' है? आम जनता का मानना है कि कर्मचारियों का यह आक्रोश दरअसल उनके 'आराम' और 'अवैध कमाई' पर लगी रोक का नतीजा है। रीवा के बाजारों और चौराहों पर अब चर्चा आम है कि पहली बार कोई अधिकारी व्यवस्था को जड़ से बदलने की कोशिश कर रहा है।
बदलाव की दहलीज पर रीवा
रीवा का प्रशासनिक भविष्य अब इस बात पर टिका है कि क्या शासन और प्रशासन इस 'सफेदपोश' दबाव के आगे झुकेगा या कलेक्टर सूर्यवंशी को उनके संवैधानिक इरादों को पूरा करने के लिए और मजबूती देगा। जिले का वर्तमान माहौल संकेत दे रहा है कि यदि कर्मचारियों ने अपना रवैया नहीं बदला, तो वह दिन दूर नहीं जब जनता खुद सड़कों पर उतरकर इन कामचोर कर्मचारियों का घेराव करेगी। यह केवल एक स्थानांतरण या पदस्थापना का मामला नहीं है, बल्कि यह रीवा के प्रशासनिक भविष्य के डीएनए को बदलने की एक बड़ी कोशिश है। अब देखना दिलचस्प होगा कि ऊँट किस करवट बैठता है—संविधान की जीत होती है या पुराने जर्जर ढर्रे की।