| बिलासपुर; हर घर पानी का हकीकत टेस्ट: सोन के दौरे में नल से निकली सच्चाई, अफसरों को मिला साफ संदेश Aajtak24 News |
बिलासपुर - राष्ट्रीय जल जीवन मिशन के संचालक कमल किशोर सोन ने सुकमा और दंतेवाड़ा जिलों का दौरा कर जमीनी स्तर पर “हर घर नल से जल” योजना की हकीकत परखी। उन्होंने गांवों में पहुंचकर न सिर्फ योजनाओं का निरीक्षण किया, बल्कि ग्रामीणों से सीधे संवाद कर पानी की गुणवत्ता और उपलब्धता की जानकारी भी ली। सुकमा के डोडपाल और फायदागुड़ा तथा दंतेवाड़ा के भूसारास गांव में श्री सोन ने जल आपूर्ति व्यवस्था, टंकियों और वितरण प्रणाली का बारीकी से निरीक्षण किया। डोडपाल में उन्होंने पानी की गुणवत्ता जांच प्रक्रिया को देखा और बारिश के मौसम में नियमित परीक्षण के निर्देश दिए। वहीं फायदागुड़ा में सोलर आधारित पेयजल योजना का निरीक्षण कर जल संरक्षण और सतत उपयोग पर जोर दिया।
भूसारास में उन्होंने घर-घर जाकर नल जल योजना से हो रही जल आपूर्ति का जायजा लिया और अपने सामने पानी की गुणवत्ता का परीक्षण भी कराया। योजना से संतुष्ट होते हुए उन्होंने ‘जल अर्पण’ के माध्यम से इसके संचालन की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत को सौंपी। दौरे के दौरान श्री सोन ने स्पष्ट निर्देश दिए कि गर्मियों में किसी भी परिवार को जल संकट का सामना न करना पड़े और कोई भी गांव योजना से वंचित न रहे। उन्होंने हर गांव में कम से कम एक व्यक्ति को तकनीकी रूप से प्रशिक्षित करने, पानी टंकियों की नियमित सफाई और स्थानीय स्तर पर समस्याओं के समाधान की व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा।
सुकमा जिला मुख्यालय में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उन्होंने राज्य के सभी कलेक्टरों की बैठक लेकर जल जीवन मिशन की प्रगति और गर्मियों में संभावित पेयजल संकट की स्थिति की समीक्षा की। उन्होंने अधिकारियों को समय-सीमा में समस्याओं का समाधान सुनिश्चित करने और दूरस्थ क्षेत्रों तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने के निर्देश दिए।इस दौरान सुकमा कलेक्टर अमित कुमार, दंतेवाड़ा कलेक्टर देवेश कुमार ध्रुव सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल
- जमीनी दौरे में सब कुछ संतोषजनक दिख रहा है, लेकिन क्या स्वतंत्र एजेंसी से पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच कराई जा रही है?
- ‘हर घर नल से जल’ का दावा है—फिर भी कई क्षेत्रों में गर्मियों में पानी की समस्या क्यों सामने आती है? क्या आंकड़े और जमीनी हकीकत में अंतर है?
- ग्राम पंचायतों को योजना का जिम्मा सौंपा गया है—लेकिन क्या उनके पास इसे लंबे समय तक सुचारू रूप से चलाने के लिए पर्याप्त संसाधन और तकनीकी क्षमता है?