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| कोण्डागांव; शिल्प से स्किल तक बदलाव की कहानी—जयपुर विशेषज्ञों ने की बस्तर की कला की सराहना Aajtak24 News |
कोण्डागांव - छत्तीसगढ़ के कोण्डागांव जिला में पारंपरिक शिल्पकला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल देखने को मिली। राजस्थान की प्रतिष्ठित संस्था Indian Institute of Crafts and Design (IICD) की विशेषज्ञ टीम ने जिले के ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा कर शिल्पकारों के कार्यों को करीब से समझा।इस दौरे का उद्देश्य पारंपरिक शिल्प को आधुनिक डिजाइन, ब्रांडिंग और बाजार की मांग के अनुरूप विकसित करना है, ताकि शिल्पकारों की आय और उत्पादों की पहुंच दोनों बढ़ सके।
ग्राम करनपुर में ढोकरा शिल्प की जटिल निर्माण प्रक्रिया ने विशेषज्ञों को खास तौर पर प्रभावित किया, वहीं छोटेराजपुर और कुसमा गांव में रॉट आयरन शिल्पकला की बारीकियों को समझा गया और शिल्पकारों से सीधे संवाद कर उनकी चुनौतियों पर चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने माना कि कोण्डागांव के शिल्पकारों में रचनात्मकता और कौशल की बड़ी क्षमता है, जिसे यदि आधुनिक डिजाइन, बेहतर फिनिशिंग और प्रभावी ब्रांडिंग का सहयोग मिले तो इन उत्पादों का मूल्य कई गुना बढ़ सकता है।
इस अवसर पर छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के अधिकारी, जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी के मार्गदर्शन में जिला एवं विकासखंड स्तर के अधिकारी भी मौजूद रहे। योजना के तहत शिल्पकारों को जयपुर में प्रशिक्षण देने की तैयारी की गई है, जहां उन्हें ई-कॉमर्स, डिजाइन नवाचार और आधुनिक विपणन तकनीकों की जानकारी दी जाएगी। इसके अलावा जयपुर टीम ने “मोर सुआद” कार्यक्रम के तहत स्थानीय व्यंजनों का स्वाद लिया और महिला स्व-सहायता समूहों के नवाचार की सराहना भी की।
आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल
- क्या शिल्पकारों को सिर्फ प्रशिक्षण दिया जाएगा या उनके उत्पादों की वास्तविक बाजार तक सीधी पहुंच और बिक्री की गारंटी भी सुनिश्चित की जाएगी?
- क्या डिजाइन और ब्रांडिंग बदलने के बाद पारंपरिक शिल्प की मौलिकता और सांस्कृतिक पहचान प्रभावित तो नहीं होगी?
- ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म तक पहुंच की बात हो रही है, लेकिन क्या ग्रामीण शिल्पकारों के लिए डिजिटल स्किल और लॉजिस्टिक सपोर्ट भी सुनिश्चित किया गया है?
