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| रीवा में 'जल-तांडव': फाइलों में बह रही विकास की गंगा, प्यास से सूख रहा जनता का हलक Aajtak24 News |
रीवा - विंध्य का हृदय कहा जाने वाला रीवा जिला आज जल संकट के एक ऐसे मुहाने पर खड़ा है, जहाँ पानी की एक-एक बूंद के लिए हाहाकार मचा है। भीषण गर्मी की दस्तक के साथ ही शहर की तंग गलियों से लेकर सुदूर पहाड़ी अंचलों तक भू-जल स्तर पाताल की ओर जा रहा है। विडंबना यह है कि हर साल कागजों पर पानी के नाम पर करोड़ों-अरबों का बजट 'सोख' लिया जाता है, लेकिन धरातल पर प्यास बुझाने के बजाय केवल भ्रष्टाचार और फाइलों का खेल जारी है।
1. मौत का भंडार: गंदी टंकियों से महामारी का खतरा
रीवा जिले में जन स्वास्थ्य के साथ हो रहा खिलवाड़ अब बर्दाश्त से बाहर है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्थापित पानी की टंकियों की स्थिति नरक से बदतर हो चुकी है। सालों से इन टंकियों की सफाई नहीं हुई है। सूत्रों का दावा है कि कई टंकियों के भीतर पक्षियों के कंकाल और उनकी गंदगी (बीट) जमा है। इसी प्रदूषित पानी की सप्लाई घरों में की जा रही है, जो सीधे तौर पर बड़ी महामारी को आमंत्रण दे रही है। पीएचई (PHE) विभाग और पंचायतों की यह लापरवाही जनता को 'धीमा जहर' पिलाने जैसी है।
2. जल जीवन मिशन: अधूरा काम, पूरा 'कमीशन'
केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी 'जल जीवन मिशन' योजना रीवा में भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है। जिले की अधिकांश पंचायतों में ठेकेदारों ने बिना काम पूरा किए ही विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से 'पूर्णता प्रमाण पत्र' हासिल कर लिए हैं। आरोप है कि सरपंचों और इंजीनियरों को 'सेवा शुल्क' (कमीशन) का भारी नजराना पेश किया गया है, जिसके बदले घटिया पाइपलाइन और अधूरे निर्माण को स्वीकार कर लिया गया। परिणाम यह है कि नल तो लग गए, लेकिन उनमें पानी का एक कतरा भी नहीं टपका।
3. बिजली बिल का 'अंधेरा' और प्यासी जनता
ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की किल्लत का एक नया और शर्मनाक पहलू सामने आया है। कई पंचायतों में केवल इसलिए जलापूर्ति बंद है क्योंकि बिजली बिल का भुगतान नहीं किया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि पंचायतों के पास अन्य फिजूलखर्ची और निर्माण कार्यों के लिए तो बजट है, लेकिन बिजली बिल जमा करने में उनकी कोई रुचि नहीं है। जानकारों की मानें तो बिजली बिल भुगतान में किसी प्रकार की 'कमीशन राशि' नहीं मिलती, इसलिए पंचायतें इसे अपनी प्राथमिकता में नहीं रखतीं। इसका सीधा दंड उन गरीब ग्रामीणों को मिल रहा है जो भीषण धूप में मीलों दूर से पानी ढोने को मजबूर हैं।
4. अस्तित्व खोते प्राकृतिक स्रोत और गिरता भू-जल
रीवा के पारंपरिक जल स्रोत जैसे ऐतिहासिक तालाब, कुएं और छोटे बांध अब इतिहास का हिस्सा बनते जा रहे हैं। भू-जल स्तर गिरने के कारण हैंडपंपों ने जवाब दे दिया है। विशेषकर पहाड़ी और पठारी क्षेत्रों में स्थिति भयावह है। जल स्रोतों के संरक्षण के प्रति न तो राजस्व विभाग गंभीर है और न ही प्रशासन। अतिक्रमण और अवैध उत्खनन ने भू-जल के पुनर्भरण (Recharge) की प्रक्रिया को ही खत्म कर दिया है।
5. प्रशासनिक विफलता या 'सोची-समझी' साजिश?
जनता के बीच अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या सिस्टम वास्तव में समाधान चाहता है? समस्याओं को सुलझाने के बजाय उन्हें उलझाए रखना शायद प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के लिए ज्यादा फायदेमंद है, ताकि हर साल आपदा के नाम पर बजट की नई बंदरबांट की जा सके।
पत्रकारिता दृष्टिकोण: अब तो जागिए प्रशासन!
रीवा का यह जल संकट अब केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि एक 'संगठित प्रशासनिक विफलता' है। यदि समय रहते पुराने तालाबों का पुनरुद्धार नहीं किया गया और कमीशनखोरी के इस मकड़जाल को नहीं तोड़ा गया, तो आने वाले समय में पानी के लिए होने वाले गृहयुद्ध को टालना नामुमकिन होगा। प्रशासन को अब फाइलों के 'एसी कमरों' से बाहर निकलकर प्यासी जनता के नलों तक पहुंचना होगा।
