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| बुरहानपुर; खेत तक पहुँचा कृषि रथ: अब दफ्तर नहीं, गांव की चौपाल में मिलेगा खेती का नया ज्ञान Aajtak24 News |
बुरहानपुर - खेती को पारंपरिक तरीके से आगे बढ़ाने के बजाय वैज्ञानिक और टिकाऊ बनाने की दिशा में कृषि विभाग ने गांवों तक पहुंचने की नई पहल शुरू की है। कृषक कल्याण वर्ष के अंतर्गत संचालित कृषि रथ अभियान के जरिए अब किसानों तक सीधे गांव की चौपाल में कृषि तकनीक, जैविक खेती और शासकीय योजनाओं की जानकारी पहुंचाई जा रही है। इसी क्रम में गुरुवार को ग्राम डवालीरैयत, डालमऊ, अमुल्लाकला खुर्द, चिंचाला और हतनुर में कृषक चौपाल कार्यक्रम आयोजित किए गए। कार्यक्रम में किसानों को खेती से जुड़े व्यावहारिक और उपयोगी विषयों पर जानकारी दी गई तथा उनकी समस्याओं और सुझावों पर भी चर्चा की गई।
चौपाल के दौरान किसानों को ई-विकास पोर्टल के माध्यम से उर्वरक वितरण प्रणाली, पंजीयन प्रक्रिया और टोकन व्यवस्था के बारे में बताया गया। विभाग ने किसानों को यह समझाने का प्रयास किया कि डिजिटल व्यवस्था से खाद वितरण को अधिक पारदर्शी और समयबद्ध बनाया जा सकता है। इसके साथ ही मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने और लागत कम करने के लिए हरी खाद के उपयोग पर विशेष जानकारी दी गई। अधिकारियों ने बताया कि लगातार रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता मिट्टी की उत्पादक क्षमता को प्रभावित कर सकती है, इसलिए वैकल्पिक और संतुलित कृषि पद्धतियां अपनाना आवश्यक है।
कार्यक्रम में किसानों को मिट्टी नमूना संग्रहण और परीक्षण की वैज्ञानिक प्रक्रिया भी समझाई गई। उन्हें बताया गया कि खेत की मिट्टी की जांच से पोषक तत्वों की वास्तविक स्थिति पता चलती है और उसी आधार पर उर्वरक उपयोग अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड के महत्व से भी अवगत कराया गया। जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए केंचुआ खाद (वर्मी कम्पोस्ट) के उपयोग और निर्माण प्रक्रिया पर जानकारी साझा की गई। साथ ही किसानों से नरवाई नहीं जलाने की अपील करते हुए बताया गया कि फसल अवशेष जलाने से मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण दोनों प्रभावित होते हैं।
कृषि चौपाल में किसानों ने अपने अनुभव भी साझा किए और खेती से जुड़े सवाल रखे। कृषि विभाग के अनुसार शुक्रवार को कृषि रथ केरपानी, गोलखेड़ा, झोलपूरा, खैरमाल, सिरसौदा और नाचनखेड़ा गांवों में पहुंचकर किसानों से संवाद करेगा।
आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल
1. कृषि रथ और चौपाल के जरिए जानकारी तो दी जा रही है, लेकिन क्या विभाग के पास ऐसा कोई डेटा है जो बताए कि इन कार्यक्रमों के बाद कितने किसानों ने वास्तव में नई तकनीक या जैविक खेती अपनाई?
2. ई-विकास पोर्टल और डिजिटल उर्वरक वितरण की बात हो रही है, लेकिन जिन किसानों के पास स्मार्टफोन या डिजिटल पहुंच नहीं है उनके लिए क्या वैकल्पिक व्यवस्था बनाई गई है?
3. हर साल नरवाई नहीं जलाने की अपील की जाती है, लेकिन फसल अवशेष प्रबंधन के लिए किसानों को वास्तविक आर्थिक या तकनीकी सहायता कितने गांवों तक पहुंची है?
