| रीवा-मऊगंज में गेहूँ उपार्जन अंतिम दौर में: स्लॉट बुकिंग में विफलता और केंद्रों पर अनियमितता के आरोपों से घिरी व्यवस्था Aajtak24 News |
रीवा - मध्य प्रदेश के रीवा और मऊगंज जिलों में रबी सीजन के तहत गेहूँ खरीदी (उपार्जन) प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है। सरकारी स्तर पर जहाँ गेहूँ का समर्थन मूल्य ₹2625 प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है, वहीं खुले बाजार में किसानों को ₹2000 से ₹2200 प्रति क्विंटल तक का भाव मिल रहा है। इस मूल्य अंतर के बावजूद, प्रशासनिक कुप्रबंधन और तकनीकी खामियों के चलते क्षेत्र के किसानों में भारी असंतोष व्याप्त है। स्थानीय जनचर्चाओं और शिकायतों के मुताबिक, सरकारी दावों के उलट धरातल पर छोटे और बड़े दोनों ही वर्ग के किसान उपज बेचने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
स्लॉट बुकिंग का संकट: 30 से 40% बड़े किसान बिक्री से वंचित होने की कगार पर
इस वर्ष उपार्जन व्यवस्था में सबसे बड़ी बाधा 'स्लॉट बुकिंग' को लेकर सामने आ रही है। आरोपों के अनुसार, शुरुआती दौर में केवल छोटे किसानों के स्लॉट बुक किए गए, जबकि बड़े किसानों को दरकिनार किया गया। वर्तमान में स्थिति यह है कि सीजन समाप्त होने को है, लेकिन लगभग 30% से 40% बड़े किसानों के स्लॉट अब तक बुक नहीं हो सके हैं। इसके चलते इन किसानों का अनाज मंडियों या घरों में डंप पड़ा है और वे अपनी उपज को समर्थन मूल्य पर बेचने से वंचित हो सकते हैं। प्रभावित किसानों द्वारा 'सीएम हेल्पलाइन 181' और संबंधित विभागीय अधिकारियों से लगातार शिकायतें की गई हैं, परंतु धरातल पर अब तक कोई ठोस सुनवाई नहीं हुई है।
खरीदी केंद्रों पर कथित 'सेवा शुल्क' और अयोग्य प्रभारियों का बोलबाला
सहकारी समितियों और उपार्जन केंद्रों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर उंगलियाँ उठ रही हैं। चर्चा है कि उपार्जन केंद्रों की मंजूरी से लेकर भंडारण तक, हर स्तर पर कथित 'सेवा शुल्क' (कमीशन) का खेल चल रहा है। नियमों को ताक पर रखकर कई केंद्रों पर अयोग्य और विक्रेताओं के वेतन पर काम करने वाले कर्मचारियों को कार्यवाहक समिति सेवक और केंद्र प्रभारी बना दिया गया है।
लोरीगढ़ केंद्र का उदाहरण देते हुए स्थानीय लोगों का कहना है कि संस्था से चौकीदार के पद पर वेतन पाने वाले कर्मी, बिना तय योग्यता के प्रभारी विक्रेता बनकर काम कर रहे हैं। सीसीटीवी कैमरों और बैंक रिकॉर्ड के अवलोकन से यह साफ देखा जा सकता है कि ऐसे संदिग्ध तत्व केंद्रों, गोदामों और बैंकों के चक्कर काटकर बिचौलियों की भूमिका निभा रहे हैं और फर्जी स्लॉट बुकिंग के जरिए वास्तविक किसानों के हक पर डाका डाल रहे हैं।
तौल में हेराफेरी: कांटों की सेटिंग और परिवहन के दौरान 'चोरी'
किसानों का आरोप है कि उपार्जन केंद्रों पर तौल में व्यापक हेराफेरी की जा रही है। डिजिटल युग में भी कई केंद्रों पर कांटों को इस तरह सेट किया जाता है कि 50 किलोग्राम की बोरी के स्थान पर किसानों से 52 किलो तक अनाज लिया जाता है, क्योंकि अधिकांश ग्रामीण किसान तौल के समय मिलान नहीं कर पाते। दूसरी तरफ, केंद्रों से गोदामों तक होने वाले परिवहन के दौरान भी ट्रकों से प्रति चक्कर 3 से 5 क्विंटल तक अनाज गायब होने की शिकायतें हैं, जिसे परिवहन चालकों और कतिपय प्रभारियों की मिलीभगत से अंजाम दिया जा रहा है।
रसूखदारों के गोदाम और निष्पक्ष जांच पर संशय
हर साल खरीफ और रबी सीजन में करोड़ों रुपये के इस कथित घोटाले की जांच केवल कागजी खानापूर्ति तक सिमट कर रह जाती है। जनचर्चाओं के अनुसार, इसका मुख्य कारण यह है कि जिन भंडारण गोदामों (Silos/Godowns) में अनाज रखा जाता है, उनमें से अधिकांश सत्ता और विपक्ष के मौजूदा व पूर्व विधायकों, सांसदों और उच्चाधिकारियों के स्वामित्व में हैं। राजनैतिक और प्रशासनिक रसूख के कारण आज तक किसी भी बड़े सिंडिकेट या बिचौलिए पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं हो सकी है, जिससे तंत्र पूरी तरह अक्षम प्रतीत हो रहा है।
टैक्सपेयर्स की अनदेखी और जन-आक्रोश: एक दृष्टिकोण
इस पूरी अव्यवस्था ने आम नागरिकों और मध्यम वर्ग को सोचने पर मजबूर कर दिया है। समाज का मानना है कि सरकार की तमाम योजनाएं किसी दल की तिजोरी से नहीं, बल्कि देश के मध्यम और निम्न वर्ग द्वारा दिए गए टैक्स (माचिस, बीड़ी, कपड़े से लेकर दवाओं तक पर लगने वाले जीएसटी) से संचालित होती हैं। ऐसे में अन्नदाता कहलाने वाले किसान के अधिकारों का हहन बेहद चिंताजनक है। यह समाचार पूरी तरह जनचर्चाओं और जनशिकायतों पर आधारित है, जिसका उद्देश्य शासन और शीर्ष प्रशासन का ध्यान रीवा-मऊगंज की जमीनी हकीकत की ओर आकर्षित करना है ताकि समय रहते निष्पक्ष जांच कर व्यवस्था सुधारी जा सके।