रीवा; राजस्व न्यायालयों में सुशासन के दावे हवा: न्याय की जगह मिल रही सिर्फ 'तारीख' Aajtak24 News

रीवा; राजस्व न्यायालयों में सुशासन के दावे हवा: न्याय की जगह मिल रही सिर्फ 'तारीख' Aajtak24 News

रीवा - जिले की तहसील और उप-तहसील कार्यालयों में इन दिनों न्याय की उम्मीद लेकर पहुंचने वाले ग्रामीण और गरीब पीड़ितों को केवल निराशा और मानसिक प्रताड़ना हाथ लग रही है। जिले के राजस्व न्यायालयों की स्थिति वर्तमान समय में अत्यंत दयनीय हो चुकी है। यहाँ आने वाले फरियादियों की सुध लेने वाला कोई नहीं है, जबकि कार्यालयों में फाइलों का रहस्यमयी तरीके से गुम हो जाना और नियमों को ताक पर रखकर विपरीत आदेश पारित करने जैसी गंभीर शिकायतें अब आम बात हो चुकी हैं। 'सुशासन' और त्वरित न्याय के बड़े-बड़े दावों के बीच धरातल पर कड़वी सच्चाई कुछ और ही बयां कर रही है।

न्याय की चौखट पर दम तोड़ती आमजन की उम्मीदें

जमीन-जायदाद और आपसी विवादों के निपटारे के लिए राजस्व न्यायालय पहुंचने वाला पीड़ित अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा अदालती कार्रवाई, कागजी औपचारिकताओं और वकीलों के चक्कर काटने में ही फूंक रहा है। इसके बावजूद, उसे न्याय मिलना तो दूर, सही सुनवाई तक नसीब नहीं हो रही है।

सबसे हैरान करने वाला मामला न्यायालयों द्वारा जारी स्थगन आदेशों (स्टे) का है। जानकारी के अनुसार, दबंगों द्वारा न्यायालय के 'स्टे' की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं और इन आदेशों का धरातल पर पालन कराने में स्थानीय प्रशासन पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है। विडंबना यह है कि अदालती आदेशों की अवहेलना करने वाले रसूखदारों पर पुलिस और राजस्व विभाग कानूनी मुकदमा दर्ज करने से भी बचता नजर आ रहा है, जिससे अपराधियों और भू-माफियाओं के हौसले बुलंद हैं।

अव्यवस्थाओं का अंबार, समीक्षा हो तो खुलेगा घोटालों का पिटारा

आज के दौर में शिक्षा और स्वास्थ्य के साथ-साथ 'न्याय' जैसी बुनियादी सुविधा के नाम पर भी वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। जागरूक नागरिकों और जानकारों का मानना है कि यदि जिले के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा तहसीलों के रिकॉर्ड, लंबित प्रकरणों और हाल ही में बंद की गई फाइलों की गहन व निष्पक्ष समीक्षा की जाए, तो राजस्व विभाग के भीतर चल रहे कई बड़े घोटाले और गंभीर वित्तीय अनियमितताएं उजागर हो सकती हैं।

वरिष्ठ अधिकारियों और सरकार के लिए चिंतन का विषय

रीवा जिले की यह बदहाल राजस्व व्यवस्था अब सीधे तौर पर शासन-प्रशासन की साख पर सवालिया निशान खड़ी कर रही है। जिले के वरिष्ठ अधिकारियों और सूबे की सरकार के लिए यह आत्ममंथन का विषय है कि क्या जीरो टॉलरेंस और सुशासन की बातें सिर्फ कागजों तक सीमित हैं? आखिर क्यों अपनी जायज मांग को लेकर आम जनता इसी तरह न्यायालय की चौखट पर आकर रोज माथा रगड़ने को मजबूर है? इस व्यवस्था में आमूलचूल सुधार और भ्रष्ट तंत्र पर कड़ा प्रहार समय की मांग बन चुका है।

Post a Comment

Previous Post Next Post