रीवा; गरीबों के निवाले पर संपन्न लोगों का 'डाका'; मऊगंज और रीवा में अपात्रों का बोलबाला Aajtak24 News

रीवा; गरीबों के निवाले पर संपन्न लोगों का 'डाका'; मऊगंज और रीवा में अपात्रों का बोलबाला Aajtak24 News 

रीवा/मऊगंज - मध्य प्रदेश सरकार द्वारा समाज के अंतिम पायदान पर खड़े गरीब और बेसहारा परिवारों को मुहैया कराई जा रही 'निशुल्क खाद्यान्न योजना' अब रीवा और मऊगंज जिलों में भ्रष्टाचार और बंदरबांट की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। जमीनी हकीकत यह है कि जिले की अधिकांश ग्राम पंचायतों में लगभग 70 प्रतिशत ऐसे लोग 'गरीबी रेखा' (BPL) सूची का अवैध लाभ उठा रहे हैं, जो वास्तव में आर्थिक रूप से पूरी तरह संपन्न हैं और सरकारी मापदंडों के अनुसार किसी भी सूरत में इस पात्रता के दायरे में नहीं आते। गरीबों के हक पर मारा जा रहा यह डाका अब व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है।

टू-व्हीलर और फोर-व्हीलर से सरकारी राशन लेने पहुंच रहे 'गरीब'

मऊगंज और रीवा जिले की शासकीय उचित मूल्य की दुकानों (राशन दुकानों) पर इन दिनों एक हैरान करने वाला नजारा आम हो चुका है। यहाँ मुफ्त या बेहद कम दाम पर मिलने वाला सरकारी अनाज लेने के लिए लोग बकायदा दोपहिया और चौपहिया वाहनों (फोर-व्हीलर) से पहुंच रहे हैं। सूत्रों की मानें तो सरकार को यह अनाज परिवहन और रख-रखाव मिलाकर करीब 50 से 60 रुपये प्रति किलो पड़ता है। लेकिन संपन्न और रसूखदार अपात्र लोग इसे निशुल्क हासिल करते हैं और बाद में इसी अनाज को खुले बाजार में 25 से 28 रुपये प्रति किलो की दर से बेचकर अवैध मुनाफा कमा रहे हैं।

सांठगांठ का खेल: रिश्वत न दे पाने के कारण असली गरीब योजना से वंचित

इस पूरे खेल के पीछे राजस्व और पंचायत विभाग के कुछ अधिकारियों व कर्मचारियों का कथित गठजोड़ काम कर रहा है। मोटी रकम और मिलीभगत के दम पर संपन्न लोगों के बीपीएल और पात्रता पर्ची कार्ड चुटकियों में बन जाते हैं। वहीं दूसरी ओर, वास्तविक गरीब— जिसके पास न सिर छुपाने को पक्की छत है और न तन ढकने को सही कपड़े— वह दफ्तरों में 'सेवा-पूजा' (रिश्वत) न दे पाने के कारण राशन कार्ड बनवाने के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है। हद तो तब हो जाती है जब ये संपन्न लोग इन्हीं फर्जी कार्डों के सहारे समूह बना लेते हैं और सरकारी स्कूलों व आंगनवाड़ियों में मध्याह्न भोजन वितरण का ठेका भी अपने नाम हथिया लेते हैं।

मौन साधे बैठा खाद्य विभाग; प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़े सवाल

इस महाघोटाले को लेकर स्थानीय स्तर पर खाद्य विभाग और संबंधित ब्लॉक स्तरीय अधिकारी पूरी तरह मौन साधे हुए हैं। जब रीवा और मऊगंज जिलों में निशुल्क अनाज वितरण के कुल आंकड़ों और लाभार्थियों की वास्तविक संख्या के संबंध में जानकारी मांगी गई, तो कोई भी सक्षम अधिकारी संतोषजनक उत्तर देने की स्थिति में नहीं दिखा। अधिकारी इस पूरे मामले से अपना पल्ला झाड़ते नजर आ रहे हैं।

क्या दोनों जिलों के कलेक्टर करेंगे इस महाघोटाले की निष्पक्ष जांच?

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या रीवा और मऊगंज जिलों के जिला प्रमुख (कलेक्टर) इस गंभीर विसंगति पर संज्ञान लेंगे? क्या इस दिशा में एक विशेष जांच समिति बनाकर पंचायतों में भौतिक सत्यापन (Physical Verification) कराया जाएगा? जागरूक नागरिकों का मानना है कि यदि पूरी ईमानदारी से अपात्रों के नाम सूची से काटे जाएं, उनसे बाजार दर पर राजस्व वसूली की जाए और फर्जीवाड़ा करने वाले अधिकारियों को निलंबित किया जाए, तो सरकार के करोड़ों रुपये के राजस्व की बचत हो सकती है और असली गरीबों को उनका हक मिल सकता है।

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