करोड़ों के गौ-संरक्षण दावों के बीच सड़कों पर तड़पता गौवंश, रीवा-मऊगंज में व्यवस्था पर उठे सवाल Aajtak24 News

करोड़ों के गौ-संरक्षण दावों के बीच सड़कों पर तड़पता गौवंश, रीवा-मऊगंज में व्यवस्था पर उठे सवाल Aajtak24 News

रीवा/मऊगंज - गौ-संरक्षण और गौवंश के संवर्धन को लेकर सरकार और प्रशासन की ओर से लगातार बड़े दावे किए जाते हैं। गौशालाओं के संचालन से लेकर बेसहारा पशुओं के संरक्षण तक विभिन्न योजनाओं के माध्यम से बजट खर्च किया जा रहा है, लेकिन रीवा-मऊगंज की सड़कों पर दिखाई दे रही तस्वीरें इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। राष्ट्रीय राजमार्गों और प्रमुख मार्गों पर बेसहारा गौवंश का जमावड़ा न केवल उनके जीवन के लिए खतरा बन रहा है, बल्कि तेज रफ्तार वाहनों के लिए भी बड़े हादसे का कारण बन सकता है।

ताजा मामला 13 अगस्त 2026 का गंगेव ब्रिज के पास का है। सर गांव के आगे एक अनियंत्रित ट्रक ने कई गायों को अपनी चपेट में ले लिया। हादसे के बाद सड़क पर गौवंश के शव पड़े रहे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, दुर्घटना के कई घंटे बाद तक स्थिति जस की तस बनी रही। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि सड़क सुरक्षा और दुर्घटना के बाद तत्काल राहत की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

आठ घंटे तक सड़क पर पड़े रहे शव, पेट्रोलिंग व्यवस्था पर सवाल

दुर्घटना के बाद सड़क से मृत अथवा घायल पशुओं को तत्काल हटाना जरूरी होता है, क्योंकि तेज रफ्तार से आने वाले वाहनों के लिए सड़क पर पड़ा गौवंश जानलेवा खतरा बन सकता है। खासकर राष्ट्रीय राजमार्गों पर अचानक सामने आने वाले पशु या उनका शव बड़े सड़क हादसे का कारण बन सकते हैं।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि नियमित पेट्रोलिंग व्यवस्था के बावजूद दुर्घटना के बाद समय पर कार्रवाई नहीं हुई। यदि किसी बड़े यात्री वाहन की टक्कर इन शवों से हो जाती तो परिणाम बेहद गंभीर हो सकते थे। ऐसे में यह मामला केवल गौवंश की सुरक्षा का नहीं, बल्कि आम राहगीरों की जिंदगी से भी जुड़ा हुआ है।

गढ़ बाईपास पर तीन गायें घायल, दो ने मौके पर दम तोड़ा

इससे पहले 10 अगस्त को गढ़ थाना क्षेत्र के बाईपास पर भी दर्दनाक हादसा सामने आया था। अज्ञात वाहन की टक्कर से तीन गायें गंभीर रूप से घायल हो गई थीं। इनमें से दो की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि तीसरी गाय गंभीर हालत में सड़क किनारे पड़ी रही।

स्थानीय लोगों का कहना है कि घायल पशु को तत्काल उपचार और सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने की जरूरत थी। जिम्मेदार अमले की भूमिका को लेकर भी सवाल उठे। लोगों का आरोप है कि सड़क किनारे तड़पते पशु को समय पर राहत नहीं मिलने से व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े हुए हैं।

जिले में बड़ी गौशाला, फिर भी सड़कें क्यों बनीं गौवंश की कब्रगाह?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब क्षेत्र में बड़ी गौशालाएं मौजूद हैं और बेसहारा पशुओं के संरक्षण के लिए सरकारी स्तर पर योजनाएं संचालित हैं, तो फिर बड़ी संख्या में गौवंश सड़कों पर क्यों दिखाई दे रहा है?

गढ़ थाना क्षेत्र के हिनौती गदही में विशाल गौशाला का निर्माण भी कराया गया है। जिले के विभिन्न क्षेत्रों में अन्य गौशालाएं भी संचालित होने की जानकारी है। इसके बावजूद यदि बेसहारा मवेशी सड़कों पर भटक रहे हैं और दुर्घटनाओं में उनकी मौत हो रही है, तो यह पूरी व्यवस्था की निगरानी और क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

सामाजिक कार्यकर्ता एवं अगस्त क्रांति मंच के संयोजक कुंज बिहारी द्वारा पूर्व में रीवा और मऊगंज की गौशालाओं से जुड़े बजट और कथित अनियमितताओं के मुद्दे भी उठाए जाते रहे हैं। ऐसे में मौजूदा घटनाओं के बाद गौशालाओं में आने वाले बजट, पशुओं की संख्या, उनके रखरखाव और वास्तविक व्यवस्था की जांच की मांग भी जोर पकड़ सकती है।

डॉक्टर ने बताया- सूचना मिलते ही शुरू किया उपचार

मामले में वेटरनरी सर्जन डॉक्टर विवेक मिश्रा से संपर्क किया गया। उन्होंने बताया कि घायल गौवंश की सूचना मिलने के बाद उपचार के लिए दवा शुरू कर दी गई है। संबंधित व्यक्तियों को भी सूचना दी गई है तथा घायल गौवंश को गौशाला में रखने की व्यवस्था बनाई जा रही है।

डॉक्टर के इस बयान से यह स्पष्ट है कि सूचना मिलने के बाद पशु चिकित्सा अमले की ओर से उपचार की प्रक्रिया शुरू की गई। अब सवाल यह है कि सड़क पर बेसहारा और घायल गौवंश पहुंचने की नौबत ही क्यों आ रही है और दुर्घटना के बाद उन्हें सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने के लिए स्थायी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा रही?

गौ-भक्ति के दावों से आगे कब बनेगी स्थायी व्यवस्था?

गौ-संरक्षण केवल भाषणों, अभियानों और बजट तक सीमित नहीं रह सकता। यदि गौवंश खुलेआम राजमार्गों पर घूमता रहेगा, दुर्घटनाओं में घायल होता रहेगा और घंटों सड़क पर पड़ा रहेगा, तो योजनाओं के वास्तविक लाभ पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

रीवा-मऊगंज की इन घटनाओं ने प्रशासन के सामने कई सीधे सवाल खड़े कर दिए हैं—सड़कों पर घूम रहे बेसहारा पशुओं की जिम्मेदारी किसकी है? दुर्घटना के बाद मृत और घायल गौवंश को हटाने की तत्काल व्यवस्था क्यों नहीं है? गौशालाओं की क्षमता और वास्तविक पशु संख्या की नियमित जांच होती है या नहीं? और गौ-संरक्षण के नाम पर खर्च होने वाले बजट का जमीनी हिसाब कौन लेगा?

अब जरूरत केवल हादसे के बाद उपचार कराने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिससे गौवंश सड़कों पर पहुंचे ही नहीं। प्रशासन यदि इन सवालों का जवाब तलाशता है और जिम्मेदारी तय करता है, तभी गौ-संरक्षण के दावे वास्तव में धरातल पर दिखाई देंगे।




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