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| धार; कलेक्टर सामने, अधिकारी स्क्रीन पर… क्या शिकायतों का समाधान भी होगा तेज? Aajtak24 News |
धार - आमजन की शिकायतों के त्वरित और प्रभावी समाधान के लिए जिला प्रशासन ने जनसुनवाई को तकनीक से जोड़ते हुए नया मॉडल अपनाया है। मंगलवार को जिला मुख्यालय स्थित जिला पंचायत सभाकक्ष में आयोजित साप्ताहिक जनसुनवाई में कलेक्टर राजीव रंजन मीना ने स्वयं मौजूद रहकर नागरिकों की समस्याएं सुनीं, जबकि जिले के सभी अनुविभागीय अधिकारी और विभागीय अधिकारी ई-गवर्नेंस के माध्यम से वर्चुअल रूप से जुड़े रहे।
प्रशासन के इस प्रयास का उद्देश्य शिकायतों के निपटारे में समन्वय बढ़ाना और आवेदनों पर तत्काल निर्णय प्रक्रिया को गति देना बताया गया। जनसुनवाई के दौरान कुल 110 आवेदन प्राप्त हुए, जिन पर कलेक्टर ने संबंधित अधिकारियों से सीधे चर्चा कर समय-सीमा में प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। जनसुनवाई में नागरिकों ने पेयजल संकट, वृद्धावस्था पेंशन, वार्डों और गांवों में सफाई व्यवस्था, सार्वजनिक स्थानों से अतिक्रमण हटाने, निजी और शासकीय भूमि पर अवैध कब्जे तथा महिला एवं बाल विकास विभाग से जुड़े मामलों को प्रमुखता से उठाया।
कलेक्टर ने स्पष्ट निर्देश दिए कि हर आवेदन का केवल औपचारिक निपटारा नहीं बल्कि गुणवत्तापूर्ण समाधान सुनिश्चित किया जाए, ताकि नागरिकों को एक ही समस्या लेकर बार-बार सरकारी कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें। जनसुनवाई के दौरान प्रशासनिक संवेदनशीलता दिखाते हुए एक जरूरतमंद आवेदक को तात्कालिक राहत के रूप में 25 हजार रुपये की आर्थिक सहायता भी मौके पर स्वीकृत कर उपलब्ध कराई गई।
कार्यक्रम में मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत अभिषेक चौधरी ने भी आवेदकों की समस्याएं सुनीं और संबंधित मैदानी अधिकारियों को वैधानिक और न्यायोचित समाधान के लिए आवश्यक निर्देश दिए। जिला प्रशासन का कहना है कि ई-गवर्नेंस और प्रत्यक्ष निगरानी के माध्यम से शिकायत निवारण को अधिक पारदर्शी, तेज और नागरिक-केंद्रित बनाया जा रहा है।
आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल
1. ई-गवर्नेंस के जरिए जनसुनवाई करने का दावा किया जा रहा है—क्या प्रशासन यह सार्वजनिक करेगा कि इस मॉडल से शिकायतों के समाधान का औसत समय कितना कम हुआ?
2. 110 आवेदन प्राप्त हुए, लेकिन क्या इनके निपटारे की स्थिति ऑनलाइन ट्रैक करने की सुविधा आम नागरिकों को भी उपलब्ध कराई जाएगी?
3. जनसुनवाई में हर सप्ताह पेयजल, पेंशन और अतिक्रमण जैसे मूलभूत मुद्दे सामने आते हैं—क्या यह विभागों की नियमित निगरानी व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाता?
