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| रीवा; जनसुनवाई या जन-सैलाब? कलेक्टर की लोकप्रियता से सत्ता और विपक्ष दोनों में खलबली Aajtak24 News |
रीवा - रीवा जिला मुख्यालय में आयोजित साप्ताहिक जनसुनवाई उस समय एक ऐतिहासिक जन-सैलाब में बदल गई, जब हजारों की संख्या में पीड़ित अपनी फरियाद लेकर पहुंचे। अमूमन ऐसी भीड़ किसी बड़े मंत्री, मुख्यमंत्री या जनप्रतिनिधि के दौरों में देखी जाती है, लेकिन मंगलवार को यह हुजूम किसी राजनेता के लिए नहीं, बल्कि रीवा के जिला कलेक्टर की कार्यशैली पर अटूट जन-विश्वास की गवाही दे रहा था।
कलेक्टर पर 70% पीड़ितों का भरोसा, अन्य विभाग खाली
कहने को तो जनसुनवाई तहसील स्तर से लेकर कमिश्नर, एसडीएम और तहसीलदार कार्यालयों सहित सभी विभागों में आयोजित हुई थी। लेकिन धरातल पर नजारा कुछ और ही था। अन्य विभागों में शिकायतों का ग्राफ लगातार गिर रहा है, जिसका सीधा मतलब है कि जनता का भरोसा अब केवल जिला कलेक्टर पर टिका है। जनसुनवाई में आने वाली भीड़ में लगभग 70% लोग गंभीर रूप से पीड़ित हैं, जबकि 30% लोग अपनी नियमित शिकायतें लेकर भटक रहे हैं। हालाँकि, जनसंपर्क विभाग या किसी अन्य आधिकारिक माध्यम से यह स्पष्ट डेटा जारी नहीं किया गया कि रीवा और मऊगंज में विभागवार कुल कितनी शिकायतें आईं और पेंडेंसी के मामले में कौन सा विभाग नंबर वन पर है।
"महीने-दो महीने के मेहमान!" – गलियारों में चर्चा और चुनौती
कलेक्टर की इस बढ़ती लोकप्रियता और निष्पक्ष कार्यशैली से प्रशासनिक गलियारों और कर्मचारियों के बीच दबी जुबान में यह चर्चा शुरू हो गई है कि वे यहाँ केवल "महीने-दो महीने के मेहमान" हैं। सत्ता पक्ष के करीबी नेताओं और रसूखदारों में भी भय व्याप्त है। उन्हें डर है कि यदि कलेक्टर के पास इसी तरह जन-सैलाब उमड़ता रहा, तो नेताओं की 'दुकानदारी और मंदी' का दौर शुरू हो जाएगा। यह इस बात का भी संकेत है कि रीवा-मऊगंज में सत्ता के जनप्रतिनिधियों के इशारे पर निचले स्तर के कर्मचारियों का भ्रष्टाचार चरम पर है, जिससे तंग आकर जनता सीधे कलेक्टर की चौखट पर दस्तक दे रही है।
विपक्ष की 'कुंभकरणी नींद' पर सवाल:
स्थानीय मीडिया और 'दैनिक आज तक 24' लगातार धरातल पर चल रहे 'सेवा शुल्क' और भ्रष्टाचार के खेल को उजागर कर रहा है। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि रीवा-मऊगंज का विपक्ष गहरी कुंभकरणी नींद में सोया हुआ है। जिन जन-समस्याओं को लेकर विपक्ष को सड़कों पर होना चाहिए था, आज उन समस्याओं को लेकर जनता कलेक्टर के पास खड़ी है। विपक्ष के दरवाजे आज खाली हैं, और वे केवल वीडियो पर बंटवारा करने (क्रेडिट लेने) तक सीमित नजर आ रहे हैं।
व्यवस्था सुधार के लिए ठोस सुझाव
कलेक्टर के प्रति जनता का विश्वास एक बहुत बड़ी चुनौती भी पेश कर रहा है। यदि इसी तरह हुजूम उमड़ता रहा, तो वास्तव में पीड़ितों की समस्या को गहराई से सुन पाना प्रशासनिक रूप से बेहद कठिन हो जाएगा। इस भीड़ को नियंत्रित करने और व्यवस्था को सुचारू बनाने के लिए प्रशासन को एक सामूहिक जन-सूचना जारी करनी चाहिए:
चरणबद्ध सुनवाई: जनता को जागरूक किया जाए कि वे अपनी पहली शिकायत अपने निकटतम स्थानीय अधिकारी (तहसीलदार/एसडीएम) से करें। समय सीमा: यदि स्थानीय स्तर पर एक महीने के भीतर सुनवाई न हो, तभी वे जिला कलेक्टर कार्यालय का रुख करें। लंबित मामलों को प्राथमिकता: जिन पीड़ितों की शिकायतें पहले से दर्ज हैं और उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है, उन्हें सीधे कलेक्टर के समक्ष प्रस्तुत होने का मौका दिया जाए। निष्कर्ष: रीवा का यह जन-सैलाब इस बात का सीधा प्रमाण है कि जनता आज भी एक ईमानदार और संवेदनशील प्रशासनिक मुखिया में अपनी उम्मीदें देखती है, बशर्ते तंत्र उनका साथ दे।
