दतिया; कलेक्ट्रेट में लगी फरियादों की अदालत: 135 से ज्यादा लोग पहुंचे, अब सवाल—निर्देश से आगे कब पहुंचेगा समाधान? Aajtak24 News

दतिया; कलेक्ट्रेट में लगी फरियादों की अदालत: 135 से ज्यादा लोग पहुंचे, अब सवाल—निर्देश से आगे कब पहुंचेगा समाधान? Aajtak24 News

दतिया - जनता की शिकायतों को सीधे प्रशासन तक पहुंचाने और उनका त्वरित समाधान सुनिश्चित करने के उद्देश्य से मंगलवार को न्यू कलेक्ट्रेट सभाकक्ष में जनसुनवाई आयोजित की गई। इस दौरान कलेक्टर स्वप्निल वानखड़े ने जिले के अलग-अलग क्षेत्रों से पहुंचे 135 से अधिक आवेदकों की समस्याएं सुनीं और संबंधित अधिकारियों को नियमानुसार एवं समय-सीमा में निराकरण के निर्देश दिए। जनसुनवाई में सामने आए मामलों ने जिले की जमीनी चुनौतियों की तस्वीर भी पेश की। किसी को वर्षों से लंबित भुगतान का इंतजार है, कहीं पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है, तो कहीं सीमांकन और प्रमाण पत्र जैसे बुनियादी काम लोगों को दफ्तरों के चक्कर लगवा रहे हैं।

सुनवाई के दौरान सेवानिवृत्त कार्यवाहक उपवन क्षेत्रपाल जगदीश प्रसाद कुशवाह ने डीपीएफ, जीपीएफ राशि और एरियर भुगतान का मामला उठाया। कलेक्टर ने मामले पर नियमानुसार कार्रवाई के निर्देश वन विभाग को दिए। वहीं ग्राम करारी खुर्द के ग्रामीणों ने पीने के पानी की समस्या प्रशासन के सामने रखी। इस पर कलेक्टर ने मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल जनपद पंचायत दतिया के सीईओ को समाधान के निर्देश दिए। जनसुनवाई में मानवीय पक्ष भी सामने आया जब ग्राम कमरारी निवासी ममता केवट ने अपने पुत्र का मृत्यु प्रमाण पत्र जारी कराने के लिए आवेदन दिया। इस पर तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए गए। इसके अलावा इंदरगढ़ क्षेत्र से सीमांकन का मामला भी पहुंचा, जिस पर तहसील स्तर पर नियमानुसार कार्रवाई के निर्देश जारी किए गए।

जनसुनवाई में रास्ता अवरुद्ध होने, नाली निकासी, वृद्धावस्था पेंशन, नामांतरण, बंटवारा, बीपीएल सूची में नाम जोड़ने, सड़क निर्माण, सफाई, खाद्यान वितरण, आर्थिक सहायता और छात्रवृत्ति जैसे अनेक मुद्दे भी सामने आए। कुछ मामलों का मौके पर ही निराकरण किया गया, जबकि शेष मामलों को समय-सीमा में हल करने के निर्देश दिए गए। प्रशासन का दावा है कि जनसुनवाई लोगों को राहत देने का माध्यम है, लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब इन निर्देशों का असर गांव और वार्ड स्तर पर दिखाई देगा।

आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल

  1. हर जनसुनवाई में पानी, सीमांकन, पेंशन और प्रमाण पत्र जैसे बुनियादी मुद्दे क्यों दोहराए जाते हैं—क्या विभागीय स्तर पर नियमित व्यवस्था प्रभावी नहीं है?
  2. 135 से अधिक आवेदन आए—प्रशासन इनके निराकरण की निगरानी कैसे करेगा और क्या इसकी सार्वजनिक समीक्षा रिपोर्ट जारी की जाएगी?
  3. कुछ मामलों का मौके पर समाधान हुआ, लेकिन बाकी मामलों में यदि समय-सीमा के भीतर कार्रवाई नहीं होती तो जिम्मेदारी किस अधिकारी की तय होगी?

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