मऊगंज में खनिज रॉयल्टी का 'महाघोटाला'? 10 सालों में 1000 करोड़ के कार्यों में अरबों की राजस्व चोरी की आशंका Aajtak24 News

मऊगंज में खनिज रॉयल्टी का 'महाघोटाला'? 10 सालों में 1000 करोड़ के कार्यों में अरबों की राजस्व चोरी की आशंका Aajtak24 News

मऊगंज - नवगठित मऊगंज जिले में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले एक दशक (2016-2026) में हुए विकास कार्यों के पीछे 'खनिज रॉयल्टी' की एक ऐसी भूलभुलैया छिपी है, जिसमें अरबों रुपये का राजस्व गायब होने की आशंका है। ग्रामीण विकास विभाग, आरईएस (RES) और ग्राम पंचायतों के माध्यम से हुए लगभग 1000 करोड़ से अधिक के निर्माण कार्यों में रेत, गिट्टी, मुरूम और डस्ट की रॉयल्टी का कोई अता-पता नहीं है।

हजारों निर्माण कार्य और गायब रॉयल्टी का 'गणित'

पिछले दस वर्षों में मऊगंज और इसके अंतर्गत आने वाली जनपद पंचायतों में पंचायत भवन, सीसी सड़कें, पुलिया, तालाब, अमृत सरोवर, गौशालाएं और जल जीवन मिशन जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स पर भारी बजट खर्च किया गया। इन कार्यों में लाखों क्यूबिक मीटर रेत, गिट्टी और मुरूम का उपयोग हुआ। नियम के मुताबिक, किसी भी निर्माण कार्य के भुगतान से पहले खनिज रॉयल्टी की रसीद (TP) और परिवहन पास का भौतिक सत्यापन अनिवार्य है। लेकिन सूत्रों का दावा है कि मऊगंज में “रॉयल्टी मुक्त विकास मॉडल” चल रहा है, जहां बिना किसी वैध रॉयल्टी के ट्रैक्टरों और हाईवा से अवैध उत्खनन की सामग्री खपाई जा रही है।

छोटे जिले का उदाहरण, मऊगंज में बड़ा सवाल

हाल ही में मध्य प्रदेश के ही एक अन्य जिले में जांच के दौरान एक वेंडर द्वारा मात्र 3 साल में 90 लाख रुपये की रॉयल्टी चोरी पकड़ी गई। अगर एक छोटे जिले का एक वेंडर इतनी बड़ी चोरी कर सकता है, तो 1000 करोड़ के बजट वाले मऊगंज जिले में यह आंकड़ा सैकड़ों करोड़ तक पहुंच सकता है। सवाल यह है कि क्या पंचायतों और आरईएस के कार्यों में उपयोग हुई खनिज सामग्री की वैध रॉयल्टी सरकारी खजाने में जमा हुई? या फिर फर्जी वेंडरों के माध्यम से जीएसटी और रॉयल्टी, दोनों की बंदरबांट कर ली गई?

भ्रष्टाचार का 'त्रिभुज': फर्जी वेंडर – फर्जी बिल – फर्जी भुगतान

ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि विकास की राशि को लूटने के लिए एक संगठित गिरोह काम कर रहा है। इसमें:

  1. फर्जी वेंडर: ऐसी फर्में जो केवल कागजों पर खनिज सप्लाई दिखाती हैं।

  2. फर्जी बिल: बिना जीएसटी और बिना रॉयल्टी वाले बिलों के माध्यम से करोड़ों का भुगतान उठाना।

  3. अधिकारी-सफेदपोश साठगांठ: क्या जिम्मेदार अधिकारी और उनके 'संरक्षक' इस पूरे खेल में हिस्सेदार हैं?

खनिज विभाग की 'रहस्यमयी' चुप्पी

जिला बनने के बाद मऊगंज में खनिज विभाग को अधिक सक्रिय होना चाहिए था, लेकिन धरातल पर विभाग की निष्क्रियता कई संदेह पैदा करती है। अवैध उत्खनन और परिवहन की निगरानी बेहद कमजोर है। ग्रामीणों का सवाल है कि आखिर किसके इशारे पर खनिज विभाग ने आंखों पर पट्टी बांध रखी है?

जांच की उठी मांग: रिकवरी और एफआईआर की तैयारी?

सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस मामले में उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। उनकी मांगें स्पष्ट हैं:

  • 2016 से 2026 तक के सभी निर्माण कार्यों के टीपी (TP), परिवहन पास और जीएसटी रिकॉर्ड का मिलान हो।

  • खनिज विभाग, जनपद और आरईएस के उन अधिकारियों को चिन्हित किया जाए जिन्होंने बिना रॉयल्टी रसीद के भुगतान जारी किए।

  • करोड़ों रुपये की राजस्व चोरी की रिकवरी दोषियों की संपत्ति कुर्क कर की जाए।

जनता का दर्द

मऊगंज की जनता आज भी पूछ रही है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी वास्तविक विकास धरातल पर क्यों नहीं दिख रहा? क्या विकास के नाम पर आने वाला पैसा केवल भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है? यदि इस 'महाघोटाले' की निष्पक्ष जांच होती है, तो यह मध्य प्रदेश के सबसे बड़े ग्रामीण निर्माण घोटालों में से एक साबित होगा। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और प्रदेश सरकार इस पर क्या कार्रवाई करती है।

Post a Comment

Previous Post Next Post