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| आबकारी विभाग पर 'सेटिंग' के दाग: ढाबे में सौदेबाजी के आरोपों से रीवा-मऊगंज की सियासत में उबाल Aajtak24 News |
रीवा - अवैध शराब कारोबार पर अंकुश लगाने के लिए जिम्मेदार आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। रीवा और नवगठित मऊगंज जिले में इन दिनों यह चर्चा आम हो चली है कि क्या आबकारी पुलिस शासन और संविधान के नियमों के तहत कार्य कर रही है, या फिर ठेकेदारों के इशारों पर संचालित हो रही है। हालिया घटनाक्रम ने इस बहस को और तेज कर दिया है। बताया जा रहा है कि कटरा क्षेत्र में अवैध शराब के विरुद्ध कार्रवाई के बाद संबंधित आबकारी टीम गढ़ के समीप स्थित एक ढाबे पर पहुंची, जहां कथित तौर पर खुलेआम सौदेबाजी किए जाने की बात सामने आई है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार 19 अप्रैल 2026 को शाम लगभग 7:08 बजे ढाबे में जिस तरह से बातचीत और लेन-देन का सिलसिला चला, उसने पूरे मामले को संदिग्ध बना दिया है। यह घटनाक्रम अब जनचर्चा का विषय बन चुका है।
सीसीटीवी फुटेज से खुल सकते हैं कई राज
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि संबंधित ढाबे में लगे सीसीटीवी कैमरों की निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो न केवल इस घटना बल्कि पूर्व में हुई ऐसी कई संदिग्ध बैठकों का खुलासा हो सकता है। आरोप है कि यह ढाबा कथित रूप से “सेटिंग” और “मैनेजमेंट” का अड्डा बनता जा रहा है, जहां कानून के बजाय समझौते की भाषा चलती है।
कार्रवाई में पक्षपात के आरोप
ग्रामीणों और जानकारों का आरोप है कि आबकारी विभाग की छापेमारी पूरी तरह निष्पक्ष नहीं है। कई बार यह देखने में आया है कि ठेकेदारों के हित प्रभावित होने पर ही अवैध पाइकारी पर सख्ती दिखाई जाती है, जबकि अन्य क्षेत्रों में खुलेआम अवैध शराब की बिक्री जारी रहती है। इससे यह संदेश जा रहा है कि विभाग की प्राथमिकता कानून लागू करना नहीं, बल्कि ठेकेदारों के आर्थिक हितों की रक्षा करना बन गई है।
2500 से 3000 अवैध शराब ठिकानों का जाल
सूत्रों की मानें तो रीवा और मऊगंज जिले में वर्तमान समय में लगभग ढाई से तीन हजार तक अवैध शराब की “पाइकारी” या गाड़ी दुकानों का संचालन हो रहा है। इतने बड़े स्तर पर चल रहे इस अवैध नेटवर्क के बावजूद विभाग की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है। यदि वास्तव में इतनी बड़ी संख्या में अवैध कारोबार सक्रिय है, तो फिर नियमित कार्रवाई के दावे कितने वास्तविक हैं—यह जांच का विषय है।
प्रशासन की साख पर उठे सवाल
इस पूरे प्रकरण ने न केवल आबकारी विभाग बल्कि समूचे प्रशासनिक तंत्र की साख को प्रभावित किया है। आम नागरिकों में यह धारणा बनती जा रही है कि नियम-कानून केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं, जबकि जमीनी स्तर पर “सिफारिश” और “सेटिंग” का बोलबाला है। ठेकेदारों और कथित राजनीतिक संरक्षण के चलते अवैध कारोबार को अभयदान मिलने के आरोप भी लगातार सामने आ रहे हैं।
निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई की मांग
सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों ने रीवा संभाग के वरिष्ठ आबकारी एवं पुलिस अधिकारियों से मांग की है कि पूरे मामले की गोपनीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए। विशेष रूप से ढाबे के सीसीटीवी फुटेज की जांच, संबंधित अधिकारियों की भूमिका की समीक्षा और अवैध शराब नेटवर्क की जमीनी हकीकत को उजागर करना आवश्यक बताया जा रहा है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन इस गंभीर मुद्दे पर ठोस कदम उठाएगा या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा। यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो अवैध शराब का यह जाल न केवल राजस्व को नुकसान पहुंचाता रहेगा, बल्कि समाज में अपराध और असुरक्षा को भी बढ़ावा देता रहेगा।
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