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| किताबों की जगह हाथों में कोरेक्स और जूठे बर्तन: विंध्य के 'भविष्य' पर नशे और बाल श्रम का ग्रहण! Aajtak24 News |
मऊगंज - विंध्य की धरा पर रीवा का गौरवशाली इतिहास हो या नवगठित मऊगंज की नई प्रशासनिक उड़ान, इन सबके बीच एक कड़वी सच्चाई यह है कि यहां का 'कल' यानी हमारा बचपन, होटलों की कालिख और नशे के धुएं में गुम हो रहा है। शहर के चमचमाते होटलों से लेकर हाईवे के धूल भरे ढाबों तक, 18 साल से कम उम्र के बच्चों की फौज दिखाई देती है, जिनके हाथों में कलम होनी चाहिए थी, लेकिन वहां अब जूठे बर्तनों का बोझ और झाड़ू की तीलियां हैं।
मजदूरी का 'सस्ता' सौदा और बचपन का कत्ल मऊगंज को जिला बने अरसा बीत गया, लेकिन प्रशासनिक सक्रियता केवल फाइलों तक सीमित नजर आती है। स्थानीय बाजार और बस स्टैंड के पास स्थित दुकानों में बच्चों को काम पर रखना एक सामान्य बात हो गई है। दुकानदार और होटल मालिक महज इसलिए मासूमों को शिकार बनाते हैं क्योंकि उन्हें न्यूनतम मजदूरी से भी कम पैसे देने पड़ते हैं। ये बच्चे न तो आवाज उठाते हैं और न ही अपने अधिकारों की बात करते हैं। विडंबना देखिए, जिस उम्र में इन बच्चों को स्कूल की आंगन में खेलना था, उस उम्र में वे बड़े-बड़े एलपीजी सिलेंडर ढो रहे हैं।
नशे की काली छाया: मेडिकल नशे का 'साइलेंट किलर' इस समस्या का सबसे डरावना पहलू यह है कि ये बाल श्रमिक केवल काम तक सीमित नहीं हैं। काम के दबाव, थकान और खराब संगति के कारण ये बच्चे 'मेडिकल नशे' (कोरेक्स, कफ सिरप, नशीली टैबलेट्स) के साथ-साथ गांजा और शराब की गिरफ्त में आ रहे हैं। रीवा और मऊगंज के ग्रामीण अंचलों में यह नशा एक 'साइलेंट किलर' की तरह फैल रहा है। कम उम्र में नशे की लत इन बच्चों के शारीरिक विकास को तो रोक ही रही है, साथ ही उन्हें जरायम (अपराध) की दुनिया की ओर भी धकेल रही है।
प्रशासनिक संवेदनहीनता के घेरे में विभाग महिला एवं बाल विकास विभाग और श्रम विभाग की भूमिका पर यहां बड़े सवालिया निशान लगते हैं। आखिर क्यों समय-समय पर इन होटलों और ढाबों पर औचक निरीक्षण नहीं किया जाता? हालांकि, मऊगंज कलेक्टर संजय कुमार जैन ने हाल ही में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के विरुद्ध सख्त कार्रवाई कर प्रशासनिक सक्रियता के संकेत दिए हैं, लेकिन बाल श्रम जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अब तक कोई बड़ा 'रेस्क्यू ऑपरेशन' देखने को नहीं मिला है।
समाज और शासन के लिए चेतावनी यदि आज इन बच्चों को नशे और श्रम के दलदल से नहीं निकाला गया, तो विंध्य का भविष्य अंधेरे में डूब सकता है। केवल नोटिस जारी करने से यह समस्या हल नहीं होगी; इसके लिए पुलिस, श्रम विभाग और सामाजिक संस्थाओं को मिलकर एक व्यापक 'नशामुक्ति और बाल अधिकार' अभियान चलाने की दरकार है। क्या जिला प्रशासन उन होटल मालिकों पर एफआईआर दर्ज करने का साहस दिखाएगा जो मासूमों की जिंदगी से खेल रहे हैं? या फिर मऊगंज की विकास गाथा इन बच्चों की सिसकियों के नीचे दबी रह जाएगी?
