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| यूपी पुलिस भर्ती परीक्षा के प्रश्नपत्र पर बवाल: 'पंडित' शब्द के प्रयोग से विद्वत समाज आहत Aajtak24 News |
रीवा - उत्तर प्रदेश पुलिस उपनिरीक्षक (SI) पात्रता परीक्षा के एक प्रश्न ने अब कानूनी और सामाजिक विवाद का रूप ले लिया है। रीवा के वरिष्ठ अधिवक्ता बी.के. माला ने परीक्षा के सामान्य हिंदी प्रश्नपत्र में 'पंडित' शब्द के नकारात्मक संदर्भ में किए गए प्रयोग पर तीव्र आक्रोश व्यक्त किया है। उन्होंने इसे न केवल विद्वत समाज का अपमान बताया है, बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार से इस पर तत्काल स्पष्टीकरण और कार्रवाई की मांग की है।
विवाद की जड़: प्रश्न क्रमांक 3 का विकल्प
पूरा मामला सामान्य हिंदी के प्रश्नपत्र से जुड़ा है। अधिवक्ता बी.के. माला के अनुसार, प्रश्न संख्या 3 में एक मुहावरे या वाक्यांश के माध्यम से 'बदल जाने' की प्रवृत्ति को समझाने के लिए चार विकल्प दिए गए थे। इन विकल्पों में 'अवसरवादी' और 'कपटपूर्ण' जैसे नकारात्मक शब्दों के साथ 'पंडित' शब्द को भी रखा गया था। अधिवक्ता का तर्क है कि इस तरह का वर्गीकरण 'पंडित' जैसे सम्मानित और ज्ञानपरक शब्द की गरिमा को गिराने वाला है।
"विद्वान किसी जाति का नहीं, ज्ञान का प्रतीक है"
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कड़े शब्दों में कहा कि 'पंडित' शब्द का शाब्दिक और व्यावहारिक अर्थ 'विद्वान' होता है। विद्वत्ता किसी धर्म, संप्रदाय या जाति की जागीर नहीं है, बल्कि यह अथाह ज्ञान का प्रतीक है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रश्नपत्र तैयार करने वाले अधिकारियों ने जानबूझकर या लापरवाही वश इस शब्द को नकारात्मक विशेषणों की श्रेणी में रखकर पूरे देश के शिक्षित और विद्वान वर्ग को अपमानित किया है।
प्रशासनिक जवाबदेही और कार्रवाई की मांग
इस मुद्दे को लेकर अधिवक्ता माला ने उत्तर प्रदेश सरकार और परीक्षा नियामक प्राधिकारी के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। उनकी मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं:
हटाया जाए विवादित अंश: पात्रता परीक्षा के आगामी प्रश्नपत्रों और वर्तमान पाठ्यक्रम से ऐसे संदर्भों को तुरंत विलोपित किया जाए।
उच्च स्तरीय जांच: इस प्रश्नपत्र को सेट करने वाले विशेषज्ञों और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के लिए जांच कमेटी बैठाई जाए।
न्यायिक कार्यवाही: धार्मिक और सामाजिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के आरोप में दोषियों पर उचित कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
बढ़ता विरोध
रीवा से उठी यह विरोध की लहर अब सोशल मीडिया के माध्यम से कानूनी गलियारों तक फैल रही है। बुद्धिजीवियों का कहना है कि प्रदेश की सबसे बड़ी भर्ती परीक्षाओं में से एक में शब्दों के चयन में बरती गई यह लापरवाही प्रशासनिक अपरिपक्वता को दर्शाती है। अब देखना यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार इस संवैधानिक और सामाजिक आपत्ति पर क्या रुख अपनाती है।
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