![]() |
| रीवा में विकास की वेदी पर चढ़ रहे हजारों हरे-भरे पेड़; रसूखदारों के आगे नतमस्तक प्रशासन Aajtak24 News |
रीवा - एक ओर सरकार 'एक पेड़ मां के नाम' जैसे अभियानों से पर्यावरण संरक्षण का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं दूसरी ओर जिला मुख्यालय रीवा से महज 50 किमी दूर गढ़ से गंभीरपुर के बीच प्रकृति के साथ खिलवाड़ का एक खौफनाक मंजर सामने आया है। राष्ट्रीय राजमार्ग (पुराना 27) और ग्रामीण मार्गों के किनारे खड़े हजारों नीलगिरी (लिप्टिस) के पेड़ों को सोची-समझी साजिश के तहत मौत के घाट उतारा जा रहा है।
निजी स्वार्थ के लिए 'केमिकल' का खेल
स्थानीय सूत्रों और धरातल की हकीकत यह है कि सड़क किनारे नवनिर्मित मकानों के मालिकों को ये वृक्ष अपनी 'शोभा' में बाधक लग रहे हैं। घरों के सामने वाहनों के आने-जाने में बाधा और पत्तियां गिरने से होने वाली गंदगी का बहाना बनाकर इन पेड़ों को पहले केमिकल डालकर सुखाया जा रहा है। जो पेड़ केमिकल से नहीं मरते, उनके लिए कानून और प्रशासन का सहारा लिया जा रहा है।
अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों का 'गठबंधन'
चौंकाने वाली बात यह है कि पर्यावरण की रक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाले लोक निर्माण विभाग (PWD), राजस्व और वन विभाग के अधिकारी कथित तौर पर जनप्रतिनिधियों के दबाव में काम कर रहे हैं। आरोप है कि मौके पर पूरी तरह स्वस्थ और मजबूत पेड़ों को कागजों में 'जर्जर' या 'खतरनाक' घोषित कर दिया गया है, ताकि उन्हें काटने का कानूनी रास्ता साफ हो सके।
जांच रिपोर्टों पर गहराता रहस्य
यदि इन पेड़ों की कटाई के लिए दी गई विभागीय रिपोर्टों की निष्पक्ष जांच की जाए, तो बड़े भ्रष्टाचार और नियमों की अनदेखी का खुलासा हो सकता है। पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि संभागीय आयुक्त को इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए। सरकारी फाइलें पेड़ों को मृत बता रही हैं, जबकि हकीकत में वे भू-माफियाओं और रसूखदारों की भेंट चढ़ रहे हैं।
पर्यावरण प्रेमियों की अपील
क्षेत्र के सजग नागरिकों ने मांग की है कि: गढ़ से गंभीरपुर के बीच काटे गए और सुखाए गए पेड़ों की फॉरेंसिक जांच कराई जाए। जर्जर घोषित करने वाले अधिकारियों की रिपोर्ट की पुनः समीक्षा उच्च स्तरीय समिति से हो। सड़क किनारे अवैध रूप से बने उन निर्माणों पर कार्रवाई हो, जिनके लिए पेड़ों की बलि दी जा रही है।
