गढ़-रीवा मार्ग: प्रशासनिक 'लकवे' और अतिक्रमण के जाल में फंसी जनता की सांसें, क्या सिर्फ मुआवजे से थमेगा मौत का तांडव? Aajtak24 News

गढ़-रीवा मार्ग: प्रशासनिक 'लकवे' और अतिक्रमण के जाल में फंसी जनता की सांसें, क्या सिर्फ मुआवजे से थमेगा मौत का तांडव? Aajtak24 News

रीवा - विंध्य क्षेत्र में सड़कों का जाल तो बिछ गया, लेकिन ये सड़कें विकास के बजाय विनाश का मार्ग साबित हो रही हैं। गढ़-रीवा मार्ग सहित जिले के ग्रामीण अंचलों में बढ़ती सड़क दुर्घटनाएं अब महज हादसा नहीं, बल्कि 'सिस्टम' द्वारा की जा रही हत्याएं प्रतीत होती हैं। अतिक्रमण की मार और राजस्व विभाग की रहस्यमयी चुप्पी ने राष्ट्रीय राजमार्गों को 'किलर जोन' में तब्दील कर दिया है।

सड़कें संकरी, हौसले बुलंद: पटरियों पर निजी कब्जा

नियमों के मुताबिक सड़कों के दोनों ओर की पटरियां (Shoulders) आपातकालीन स्थिति और पैदल यात्रियों के लिए खाली होनी चाहिए। लेकिन तेंदुआ से देवतालाब, गढ़ से नईगढ़ी और गढ़ से कटरा बायपास मार्ग पर हकीकत इसके उलट है। यहाँ सड़कों की पटरियां अब कागजों तक सीमित रह गई हैं। दबंगों और स्थानीय लोगों ने सड़क किनारे:

  • मवेशियों को बांधने के लिए खूंटे गाड़ दिए हैं।

  • निजी बाड़ी और बाउंड्री वॉल खड़ी कर ली है।

  • लकड़ियों और निर्माण सामग्री का अंबार लगा दिया है।

नतीजतन, तेज रफ्तार वाहनों को जरा सी चूक पर संभलने की जगह नहीं मिलती और वे सीधे मौत से टकरा जाते हैं।

राजस्व का 'खेल': अधिग्रहण के बाद भी रिकॉर्ड से गायब जमीन

सबसे बड़ा घोटाला सरकारी अभिलेखों में नजर आता है। परासी, गढ़ और मढ़ी जैसे क्षेत्रों में राष्ट्रीय राजमार्ग के लिए जमीन का अधिग्रहण तो हुआ, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में इसे स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं किया गया। इसी 'लूपहोल' का फायदा उठाकर भू-माफिया सरकारी जमीन की अवैध खरीद-बिक्री कर रहे हैं। आश्चर्य की बात यह है कि MPRDC (मप्र सड़क विकास निगम) की टीमें रोजाना सड़कों पर गश्त करती हैं, लेकिन उन्हें सड़क के बीचों-बीच खड़ा अतिक्रमण कभी दिखाई नहीं देता।

"प्रशासन का काम केवल लाशें गिनना और मुआवजा बांटना रह गया है। असली दोषियों पर बुलडोजर कब चलेगा?" — एक पीड़ित ग्रामीण का आक्रोश

कार्रवाई के नाम पर सिर्फ 'खानापूर्ति'

जब भी कोई बड़ी दुर्घटना होती है, प्रशासन सक्रिय होता है, मुआवजे का मरहम लगाता है और मामला फाइलों में दफन हो जाता है। आज तक रीवा प्रशासन ने उन लोगों पर कोई बड़ी कानूनी कार्रवाई नहीं की, जिन्होंने सड़क को अपनी निजी जागीर बना रखा है। सवाल यह है कि क्या सरकारी खजाने का पैसा केवल लापरवाही की कीमत चुकाने के लिए है?

जनता की मांग: 'जीरो टॉलरेंस' और जवाबदेही

क्षेत्रीय जनता ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। उनकी प्रमुख मांगें हैं:

  1. अतिक्रमण मुक्त सड़क: तत्काल विशेष अभियान चलाकर पटरियों से कब्जा हटाया जाए।

  2. अधिकारियों पर FIR: जिन अधिकारियों की देखरेख में अवैध कब्जे हुए, उन पर लापरवाही का मामला दर्ज हो।

  3. डिजिटल रिकॉर्ड: अधिग्रहित जमीन का रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए ताकि अवैध बिक्री रुके।

  4. वास्तविक गश्त: गश्ती दल केवल खानापूर्ति न करे, बल्कि सड़क पर रखे अवरोधों को तत्काल हटवाए।

रीवा का गढ़ मार्ग आज प्रशासनिक अनदेखी का सबसे बड़ा स्मारक बन चुका है। यदि आला अधिकारियों ने अपनी 'कुंभकर्णी नींद' नहीं त्यागी, तो मुआवजे की रकम तो बढ़ती रहेगी, लेकिन जो घर उजड़ रहे हैं, उनकी भरपाई कोई सरकार नहीं कर पाएगी।

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