भ्रष्टाचार की 'तहसील': रीवा-मऊगंज में राजस्व न्यायालय बने वसूली के अड्डे, सेवा शुल्क बिना नहीं चलती पटवारी की जंजीर Aajtak24 News

भ्रष्टाचार की 'तहसील': रीवा-मऊगंज में राजस्व न्यायालय बने वसूली के अड्डे, सेवा शुल्क बिना नहीं चलती पटवारी की जंजीर Aajtak24 News

रीवा/मऊगंज - विंध्य क्षेत्र में राजस्व विभाग और उसके न्यायालय आम जनता के लिए 'न्याय के मंदिर' कम और 'वसूली केंद्र' ज्यादा नजर आ रहे हैं। जिले की अधिकांश तहसीलों की हालत यह है कि यहाँ समय पर ताले तक नहीं खुलते, और यदि ताले खुल भी जाएं तो अधिकारी अक्सर "मीटिंग" के नाम पर नदारद मिलते हैं। भ्रष्टाचार का आलम यह है कि लोकायुक्त की लगातार कार्रवाइयां और सोशल मीडिया पर वायरल होते वीडियो इस बात की तस्दीक कर रहे हैं कि बिना 'सेवा शुल्क' यहाँ पत्ता भी नहीं हिलता।

'चढ़ोत्तरी' बिना नहीं होता सीमांकन

ग्रामीण अंचलों में सीमांकन एक बड़ी समस्या है, लेकिन राजस्व निरीक्षक (RI) और पटवारी ने इसे अपनी कमाई का जरिया बना लिया है। आरोप है कि जब तक उनकी जेब गरम नहीं की जाती, तब तक सीमांकन की 'जंजीर' जमीन पर नहीं उतरती। जांच प्रतिवेदन के नाम पर महीनों चक्कर कटवाना और फिर मोटी रकम की मांग करना अब यहाँ की कार्यप्रणाली का हिस्सा बन चुका है।

न्याय में भेदभाव: रसूखदारों की फाइलें तेज, गरीबों की सालों पेंडिंग

राजस्व न्यायालयों में लंबित प्रकरणों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। सवाल यह उठता है कि कुछ रसूखदारों के मामलों में 6 महीने के भीतर निर्णय कैसे हो जाता है, जबकि गरीब जनता वर्षों से पेशी पर पेशी काट रही है? जिनके पास रिश्वत देने के लिए पैसे नहीं हैं, उनकी फाइलें धूल फांक रही हैं या फिर 'चोरी' हो जाती हैं। लोग तहसील से कमिश्नरी और फिर रिवेन्यू बोर्ड तक चक्कर लगाकर थक चुके हैं, अंततः उन्हें दीवानी न्यायालय (Civil Court) की शरण लेनी पड़ती है।

सत्ता और विपक्ष की 'कुंभकर्णी नींद'

हैरानी की बात यह है कि जिले की इस बदहाली पर स्थानीय जनप्रतिनिधि और विपक्ष दोनों ने चुप्पी साध रखी है। सत्ता पक्ष जहाँ सत्ता के सुख में मग्न है, वहीं विपक्ष भी जनता की इन बुनियादी समस्याओं को लेकर संघर्ष करने के मूड में नहीं दिखता। ऐसा प्रतीत होता है कि आम जनता की गाढ़ी कमाई लूटने वाले इस तंत्र को रोकने वाला कोई नहीं है।

जनता की मांग: बंद हों ये न्यायालय

व्यवस्था से त्रस्त जनता अब यह कहने लगी है कि यदि सरकार न्याय नहीं दे सकती, तो इन राजस्व न्यायालयों को बंद कर देना चाहिए। इससे कम से कम लोगों का समय और वकीलों की फीस पर होने वाली गाढ़ी कमाई तो बचेगी। फाइलों के हेर-फेर और भ्रष्टाचार के इस खेल ने प्रशासन की साख को पूरी तरह धूमिल कर दिया है।

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