व्यवस्था की सुस्ती पर 'जनशक्ति' का पहरा; 12 साल के धैर्य के बाद अब बदलाव की हुंकार Aajtak24 News

 व्यवस्था की सुस्ती पर 'जनशक्ति' का पहरा; 12 साल के धैर्य के बाद अब बदलाव की हुंकार Aajtak24 News

रीवा/मनगवां - लोकतंत्र की असली ताकत उसकी जनता है, और जब जनता अपने अधिकारों के लिए जागरूक हो जाए, तो बड़े से बड़ा प्रशासनिक ढांचा भी हरकत में आने को मजबूर हो जाता है। मध्य प्रदेश के रीवा जिले की मनगवां तहसील के ग्राम पैपखार (पंचायत रक्सा मांजन) से एक ऐसी ही तस्वीर उभर रही है, जहाँ ग्रामीणों ने व्यवस्था की उदासीनता के खिलाफ अब 'सत्याग्रह' का रास्ता चुनने का मन बना लिया है। यह खबर केवल एक शिकायत की नहीं, बल्कि अपने गांव के अस्तित्व को बचाने के लिए एकजुट हुए 500 ग्रामीणों के संकल्प की है।

धैर्य की पराकाष्ठा: 2014 से 2026 तक का सफर

अक्सर कहा जाता है कि न्याय मिलने में देरी न्याय न मिलने के बराबर है। ग्राम पैपखार के निवासी और रिटायर्ड पुलिसकर्मी रोशन लाल कुशवाहा इस बात के जीवंत उदाहरण हैं। पिछले 12 वर्षों (2014-2026) से वे फाइलों का बंडल लेकर कलेक्टर से लेकर कमिश्नर तक के चक्कर काट रहे हैं। एक पूर्व पुलिसकर्मी, जिसने जीवन भर कानून की रक्षा की, आज खुद कानून के पालन के लिए दफ्तरों की चौखट पर 'पेशी दर पेशी' माथा टेक रहा है। उनकी यह जिजीविषा सराहनीय है कि इतने वर्षों की निष्प्रभावी कार्यप्रणाली के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी।

सिमटती सड़कें और रुकता विकास

समस्या केवल 1 एकड़ 22 डिसमिल जमीन पर अवैध कब्जे की नहीं है, बल्कि गांव के भविष्य की है। जो सड़क कभी 40 फीट चौड़ी हुआ करती थी और गांव के विकास की जीवनरेखा थी, वह आज अतिक्रमण की भेंट चढ़कर मात्र 10 फीट की संकरी गली बनकर रह गई है।

  • प्रभाव: संकरे रास्ते के कारण न तो कृषि कार्य के लिए ट्रैक्टर निकल पाते हैं और न ही आपातकाल में एम्बुलेंस।

  • सामाजिक संकट: शादी-ब्याह और अन्य मांगलिक कार्यक्रमों में बड़े वाहनों का आवागमन बंद होने से ग्रामीणों का सामाजिक जीवन प्रभावित हो रहा है।

प्रशासनिक चुनौती और ग्रामीणों का विश्वास

हैरानी की बात यह है कि जिले के सर्वोच्च अधिकारी (कलेक्टर) ने तहसीलदार को 15 दिनों के भीतर कार्रवाई का स्पष्ट निर्देश दिया था, लेकिन निचली प्रशासनिक मशीनरी की 'कछुआ चाल' ने आदेशों को फाइलों में ही कैद कर रखा है। प्रशासन की इसी चुप्पी ने अब ग्रामीणों को आंदोलन के लिए प्रेरित किया है। ग्रामीणों का कहना है कि वे टकराव नहीं, बल्कि समाधान चाहते हैं। उनका 'अल्टीमेटम' प्रशासन को एक अवसर है कि वह अपनी विश्वसनीयता को पुनः स्थापित करे।

आंदोलन की राह: चेतावनी या सुधार का मौका?

रोशन लाल कुशवाहा और समस्त ग्रामीणों ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि एक माह के भीतर अतिक्रमण नहीं हटा, तो तहसीलदार कार्यालय के सामने धरना प्रदर्शन किया जाएगा। यह आंदोलन उग्र होने के बजाय 'न्याय की मांग' का एक सशक्त स्वर है। ग्रामीणों का यह सामूहिक नेतृत्व बताता है कि गांव अब अपनी समस्याओं को लेकर किसी 'मसीहा' के इंतजार में नहीं बैठेगा, बल्कि खुद नेतृत्व करेगा।  पैपखार के ग्रामीणों का यह आक्रोश दरअसल एक उम्मीद है—उम्मीद एक पारदर्शी प्रशासन की, उम्मीद एक अतिक्रमण मुक्त गांव की। अब गेंद प्रशासन के पाले में है। क्या जिम्मेदार अधिकारी अपनी नींद त्यागकर इन 500 ग्रामीणों के चेहरों पर मुस्कान वापस लाएंगे? या फिर एक बार फिर फाइलों का बोझ न्याय की उम्मीदों को दबा देगा? पूरा जिला अब मनगवां की इस 'जनशक्ति' और प्रशासन की 'प्रतिक्रिया' पर नजरें टिकाए बैठा है।




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