रीवा–मऊगंज में धान खरीदी 2025–26 पर उठते सवाल — अव्यवस्थाओं, बिचौलियों और 'सेवा शुल्क' के खेल से किसान परेशान Aajtak24 News

रीवा–मऊगंज में धान खरीदी 2025–26 पर उठते सवाल — अव्यवस्थाओं, बिचौलियों और 'सेवा शुल्क' के खेल से किसान परेशान Aajtak24 News

रीवा/मऊगंज - जिले में धान खरीदी वर्ष 2025–26 की तैयारियां प्रारंभ तो हो रही हैं, लेकिन खेत से मंडी तक की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। बिचौलियों का सक्रिय रहना, प्रशासन की शिथिलता, खरीदी केंद्रों के अनुचित स्थल चयन, और अप्रत्यक्ष ‘सेवा शुल्क’ की अनिवार्यता किसानों की बड़ी चिंता बन चुकी है। किसानों का कहना है कि केंद्र परिवर्तन, स्थल परिवर्तन और स्वीकृति की प्रक्रिया में पहले से ही निश्चित ‘सेवा शुल्क’ तय कर दिया जाता है। जिस स्थान के लिए भुगतान किया जाए, वही खरीदी केंद्र स्वीकृत हो जाता है। कई बार मिट्टी, कीचड़ और जलभराव वाले स्थान पर भी केंद्र बना दिए जाते हैं, जिससे बारिश की स्थिति में धान खराब होना तय है। लेकिन आज तक किसी भी ऐसे जिम्मेदार कंप्यूटर ऑपरेटर या खरीदी केंद्र प्रभारी पर कार्रवाई नहीं हुई, जिन्होंने अनुचित या असुरक्षित स्थल को स्वीकृति दी।

बारिश में धान संरक्षण पर सवाल

प्रशासन यह दावा करता है कि खरीदी सुचारू रूप से होगी, लेकिन क्या दशमलव बिंदु, तिरपाल या साधारण व्यवस्था भारी बारिश में धान को बचा पाएगी? किसानों में यह भी चर्चा तेज है कि क्या प्रशासन के पास कोई वैज्ञानिक उपकरण है जो बारिश रोक सके? खेतों में अंकुरित और नमीग्रस्त धान को बेच पाना पहले ही मुश्किल है, ऊपर से खरीदी केंद्रों पर अतिरिक्त ‘सेवा शुल्क’ किसान की जेब और हल्की कर देता है।

खरीदी से लेकर भंडारण तक शुल्क का लंबा खेल

रीवा जिले में किसानों का आरोप है कि खरीदी केंद्र से लेकर परिवहन और भंडारण तक हर चरण में ‘अनिवार्य शुल्क’ चल रहा है। गुणवत्ता जांच कागज़ों पर कर्मचारियों की जिम्मेदारी बताई जाती है, लेकिन वास्तविक नियंत्रण गोदाम संचालकों और केंद्र प्रभारियों के हाथ में रहता है। पिछले वर्ष परिवहन, खरीदी और भंडारण में हुए करोड़ों के कथित घोटाले आज भी अभिलेखों में दफन हैं। जिले में कई प्रभावशाली नेताओं, पत्रकारों और पदाधिकारियों के गोदाम हैं, जिनकी जांच कभी नहीं की जाती। प्रशासन सिर्फ दिखावटी निरीक्षण कर जनता को भ्रम में रखता है।

बिचौलियों का नेटवर्क और किसानों की मजबूरी

बिचौलिये खेतों से 1400 से 1500 रुपये प्रति क्विंटल तक धान खरीदकर गोदामों में भर रहे हैं। बाद में यही धान पंजीकृत किसानों के नाम से सरकारी केंद्रों पर बेचा जाता है। इस प्रक्रिया में लगभग ₹100 प्रति क्विंटल ‘व्यवस्था शुल्क’ तय रहता है—

₹50 किसान के नाम के उपयोग पर

₹50 खरीदी केंद्र प्रभारी

शेष अन्य खर्च

जिन सोसायटियों में नियमित कर्मचारी नहीं हैं, वहां ठेके पर लोगों को रखा जा रहा है। जिन कर्मचारियों पर पिछले वर्ष अनियमितता के आरोप लगे थे, उनकी जांच आज तक नहीं हुई। जहां कमियां पाई गईं, उन्हें सुधारने के नाम पर फिर से अतिरिक्त शुल्क वसूले गए—लेकिन जांच रिपोर्ट में इसका कोई उल्लेख नहीं।

हमारा उद्देश्य—जनता और प्रशासन के बीच संवाद

हम केवल जनता की समस्याएँ प्रशासन तक और प्रशासन की जानकारी जनता तक पहुँचाने का माध्यम हैं। हम किसी भी आरोप की पुष्टि नहीं करते, परंतु किसानों की पीड़ा और अव्यवस्थाओं की वास्तविकता को सामने लाना हमारा दायित्व है। धान खरीदी 2025–26 शुरू होने से पहले यदि इन मुद्दों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो किसानों की परेशानियाँ एक बार फिर बढ़ना तय है।


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