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राजस्व न्यायालय की फाइलें गायब, अधिवक्ता संघ ने उठाए गंभीर सवाल |
रीवा - रीवा जिले की मनगवां तहसील स्थित अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) न्यायालय में गंभीर प्रशासनिक अनियमितता उजागर हुई है। पूर्व अधिवक्ता संघ अध्यक्ष प्रभात चंद्र द्विवेदी ने आरोप लगाया है कि संविदा कर्मचारियों की मिलीभगत से कई महत्वपूर्ण प्रकरणों की फाइलें न्यायालय से रहस्यमय तरीके से गायब कर दी गई हैं। इस मामले की शिकायत विभागीय अधिकारी राजस्व संजय एजेंसी तक पहुंचाई गई, लेकिन हैरानी की बात है कि अब तक किसी भी स्तर पर ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
अधिवक्ताओं और पक्षकारों ने कहा कि फाइलों के गायब होने से न्यायिक प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित हुई है। न तो सुनवाई आगे बढ़ पा रही है और न ही पीड़ित पक्ष न्याय पा रहे हैं। अधिवक्ता संघ का कहना है कि यह स्थिति केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित कृत्य प्रतीत होती है। श्री द्विवेदी ने आरोप लगाया कि तहसील कार्यालय में सीसीटीवी कैमरे मौजूद होने के बावजूद यह घटना हुई, जो गंभीर सवाल खड़े करती है। उन्होंने कहा— “जब सरकार न्यायिक प्रक्रिया को ऑनलाइन और पारदर्शी बनाने की दिशा में काम कर रही है, तब स्थानीय स्तर पर फाइलें गायब होना पूरे सिस्टम की साख पर दाग है। यह घटना मनगवां ही नहीं, बल्कि पूरे रीवा जिले के लिए चिंताजनक है।”
इस पूरे मामले ने अधिवक्ता संघ और आमजन दोनों में गहरी नाराज़गी पैदा कर दी है। अधिवक्ता संघ का कहना है कि यदि शीघ्र ही फाइलें बरामद नहीं हुईं और दोषी कर्मचारियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं की गई, तो वे आंदोलनात्मक कदम उठाने पर विवश होंगे। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह मामला केवल कुछ फाइलों के गायब होने का नहीं है, बल्कि न्याय तक पहुंच के मौलिक अधिकार से जुड़ा प्रश्न है। यदि न्यायालय की फाइलें ही सुरक्षित नहीं हैं, तो आम जनता कैसे भरोसा करेगी कि उनके प्रकरणों का निष्पक्ष निपटारा होगा?
वहीं, राजस्व विभाग के उच्चाधिकारियों की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। सूत्रों का कहना है कि शिकायत मिलने के बाद भी न तो प्रारंभिक जांच हुई और न ही किसी कर्मचारी से पूछताछ। इससे यह आशंका और गहरी हो गई है कि कहीं यह पूरा मामला ऊपर तक दबाने की कोशिश तो नहीं की जा रही। मनगवां तहसील कार्यालय का यह प्रकरण अब जिले भर में चर्चा का विषय बन गया है। लोग मांग कर रहे हैं कि इसकी उच्च स्तरीय जांच हो और जिम्मेदार कर्मचारियों पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि भविष्य में न्यायालय जैसी संवेदनशील जगहों पर ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
