काशी में लोलार्क छठ का महापर्व: संतान प्राप्ति के लिए उमड़ा जनसैलाब, आस्था और विज्ञान का अद्भुत संगम sangam Aajtak24 News

काशी में लोलार्क छठ का महापर्व: संतान प्राप्ति के लिए उमड़ा जनसैलाब, आस्था और विज्ञान का अद्भुत संगम sangam Aajtak24 News

वाराणसी/उत्तर प्रदेश - धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी शुक्रवार को आस्था के जनसैलाब से सराबोर हो गई। भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर मनाए जाने वाले लोलार्क छठ महापर्व के अवसर पर, संतान की कामना और शारीरिक कष्टों से मुक्ति के लिए देश भर से लाखों श्रद्धालु शहर के भदैनी स्थित पौराणिक लोलार्क कुंड में पहुंचे। मध्य रात्रि से ही लोगों ने घंटों कतार में खड़े होकर आस्था की डुबकी लगाई। अनुमान है कि इस एक दिन में लगभग 2 लाख से अधिक लोगों ने इस पवित्र कुंड में स्नान किया।

कुंड का पौराणिक महत्व और मान्यताएँ

लोलार्क कुंड का उल्लेख स्कंद पुराण, शिव पुराण, और विष्णु पुराण जैसे कई प्राचीन धर्मग्रंथों में मिलता है। मान्यता है कि सृष्टि में जीवन और पवित्रता का विस्तार करने के लिए भगवान महादेव ने सूर्यदेव को अपने दूत के रूप में काशी भेजा था। चूंकि भगवान सूर्य (जिन्हें 'अर्क' भी कहा जाता है) का मन काशी के दर्शन के लिए 'लोल' (चंचल) हो उठा था, इसलिए उनकी यहां 'लोलार्क' के नाम से ख्याति हुई।

पुरोहित अविनाश पांडेय के अनुसार, यह कुंड भगवान सूर्य के रथ के पहिए के फंसने से बना था, जबकि एक और मान्यता यह है कि सदियों पहले यहां एक बड़ा उल्कापिंड गिरा था, जिससे इसका निर्माण हुआ। ऐतिहासिक रूप से, इस कुंड की महिमा एक शिलापट्ट पर भी वर्णित है, जिसमें बताया गया है कि पश्चिम बंगाल के एक राजा चर्म रोग और निःसंतान होने की समस्या से पीड़ित थे। यहां स्नान के बाद न केवल उनका चर्म रोग ठीक हुआ, बल्कि उन्हें पुत्र रत्न की भी प्राप्ति हुई, जिसके बाद उन्होंने इस कुंड का जीर्णोद्धार कराया। इस कुंड में स्नान करने और लोलार्केश्वर महादेव की पूजा करने से दंपतियों को अभीष्ट वरदान मिलता है। यह भी कहा जाता है कि रविवार के दिन षष्ठी पड़ने पर यहां यात्रा करके मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

आस्था के विशेष नियम और परंपराएं

लोलार्क कुंड में स्नान के कुछ विशेष नियम हैं, जिनका पालन करना अत्यंत आवश्यक माना जाता है। पुजारी शशि भूषण उपाध्याय ने बताया कि:

  1. संयुग्म स्नान: संतान की कामना से आने वाले पति-पत्नी को एक साथ हाथ पकड़कर कुंड में तीन बार डुबकी लगानी चाहिए।

  2. फल-सब्जी का त्याग: स्नान के बाद दंपत्ति किसी एक फल या सब्जी का चयन करते हैं और उसका जीवनभर के लिए त्याग कर देते हैं। इस फल या सब्जी का दान भी कुंड में ही किया जाता है। जब तक उनकी मनोकामना पूरी नहीं होती, तब तक वे उसका सेवन नहीं करते।

  3. वस्त्रों का त्याग: कुंड में स्नान के बाद, श्रद्धालु अपने पहने हुए पुराने कपड़े वहीं पर छोड़ देते हैं, जिसे त्याग का प्रतीक माना जाता है।

ये नियम न केवल धार्मिक हैं, बल्कि आत्म-नियंत्रण और समर्पण का भी प्रतीक माने जाते हैं।

विज्ञान की कसौटी पर आस्था

इस कुंड की चमत्कारी शक्तियों पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के वैज्ञानिक भी शोध कर रहे हैं। बीएचयू के प्रोफेसर प्रवीण सिंह राणा के अनुसार, लोलार्क छठ के दिन कुंड का पानी विशेष रासायनिक और ऊर्जावान गुण धारण कर लेता है, जिससे शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, यहां स्नान करने वाले लगभग 60% लोगों की मनोकामनाएं पूरी हुई हैं। यह शोध यह साबित करता है कि लोलार्क कुंड केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि इसके पीछे एक वैज्ञानिक आधार भी हो सकता है।

प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था

इस विशाल जनसैलाब को देखते हुए जिला प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बैरिकेडिंग की गई थी और कई मजिस्ट्रेट तथा सैकड़ों पुलिसकर्मी जगह-जगह तैनात थे। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पेयजल और बिजली की भी पर्याप्त व्यवस्था की गई थी। स्थानीय विधायक सौरभ श्रीवास्तव भी लगातार अधिकारियों के संपर्क में थे और मेला क्षेत्र का जायजा ले रहे थे, ताकि किसी भी तरह की अप्रिय घटना न हो।

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