कालाबाजारी का खेल: 270 रुपये की बोरी 1,000 में
सरकारी तय दर के अनुसार, यूरिया की एक बोरी की कीमत सिर्फ 270 रुपये है। लेकिन, कालाबाजारी के कारण वही बोरी बाजार में 1,000 रुपये तक में बिक रही है। किसान, जो अपनी फसलों के लिए यूरिया लेने के लिए दो-दो दिन तक लंबी कतारों में खड़े रहते हैं, अक्सर खाली हाथ लौटते हैं। उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर माफिया उन्हें ऊंचे दामों पर खाद बेच रहे हैं, जिससे किसानों को भारी नुकसान हो रहा है।
प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल
सरकार ने कालाबाजारी रोकने के लिए कागजों पर तो कई दावे किए हैं, जैसे कि कलेक्टर की विशेष टीम, कृषि विभाग और पुलिस की संयुक्त कार्रवाई, लेकिन जमीनी स्तर पर ये सभी प्रयास विफल दिख रहे हैं। अधिकारी खुद मान रहे हैं कि उनके पास संसाधन कम हैं और दबाव ज्यादा है। बावजूद इसके, जब वायरल वीडियो में कालाबाजारी का साफ सबूत मौजूद है, तो खाद माफियाओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं हो रही, यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है।
किसानों का दर्द और भविष्य पर खतरा
इस कालाबाजारी का सीधा असर किसानों की फसलों पर पड़ रहा है। खेतों में खड़ी फसलें पीली होकर दम तोड़ रही हैं, और किसान मायूस हो चुके हैं। वे कहते हैं, "अगर खेत ही सूख जाएंगे, तो सरकार की सम्मान निधि और अन्य योजनाओं के पैसों का क्या करेंगे?" यह सिर्फ एक कालाबाजारी का मामला नहीं है, बल्कि यह किसानों की जिंदगी और उनके भविष्य से खिलवाड़ है। पूरा जिला प्रशासन से यह सवाल कर रहा है कि क्या वह खाद माफियाओं के सामने घुटने टेक चुका है?
यह खबर स्थानीय सूत्रों से मिली जानकारी पर आधारित है, और पुलिस की जांच के बाद ही इसकी सच्चाई पूरी तरह सामने आ पाएगी।