श्रीमद्‌भागवत महापुराण साक्षात् भगवान - पं. मनोज पाण्डेय panday Aajtak24 News


श्रीमद्‌भागवत महापुराण साक्षात् भगवान - पं. मनोज पाण्डेय panday Aajtak24 News 

चांपा - कोसा कांसा और कंचन की नगरी चांपा के स्व. जीवनलाल साव सामुदायिक भवन में केसरवानी परिवार द्वारा स्व. देवकुमारी केसरवानी जी के वार्षिक श्राद्ध निमित्त श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ आयोजित है जहां तीसरे दिन के कथा का विस्तार करते हुए श्रद्धेय ब्यासपीठ पंडित मनोज पाण्डेय जी ने कहा कि श्रीकृष्णजी का ही स्वरूप है, अज्ञान के अंधकार में मंटक रहे जीवों के कल्याण के लिए दीप स्वरूप इस ग्रंथ को प्रकट किया गया। 18 पुराणों में भागवत जी का स्थान सर्वोपरी है। ये सभी पुराणों का सार है। परीक्षित जी मां के गर्भ मे थे तो उन पर ब्रहमास्त्र का प्रयोग हुआ । भगवान श्रीकृण जी ने रजा की। जब परीक्षित राजा बने और बाड में ब्राहमण के गले में मरा सांप डाला तो 7 दिन में मरने का शाप मिला संत के शाप और सांप के काटने से मृत्यु होने पर जीव को नर्क में जाना पड़ता है। परन्तु भगवान की कथा का श्रवन कर परीक्षित मुक्त हो गये। परीक्षित जीव है। तक्षक काल है। जीव रूपों परीक्षित काल रूपी तजक से बचना चाहे तो भगवान की कथा का आश्रय ले। भीष्म पितामह जी के देहत्याग का वर्णन बहुत ही अद्‌भुत है। जीव अंतिम समय में भगवान का नाम भी स्मरण कर ले तो कल्याण हो जाता है। भीष्म जी तो भगवान का प्रत्यक्ष दर्शन, प्रणाम, स्तुति कर शरीर त्यागे। और मृत्यु के समय मुहुर्त भी अति उत्तम था। उत्तरायण, माघमास, शुक्ल पक्ष और अष्टमी तिथि । लेकिन सभी जीवों के लिए इस प्रकार का संयोग दुर्लम है। भीष्म जी उत्तरायण में जाने का  रहस्य इस प्रकार है वर्ष में 6 माह उत्तरायण और 6 माह दक्षिणायन रहता है। उत्तरायण में मरना श्रेष्ठ माना गया है। जीवन के जिस काल खण्ड में जीव पापमय जीवन जीये वो दक्षिणायन है, और पुण्यमय जीवन जिए वो  उत्तरायण है।  हम सब सदैव सजग रहें कि हमारे जीवन में कभी दक्षिणायन का प्रवेश ही न हो फिर कभी भी मृत्यु हो जीव का कल्याण हो जायेगा। उत्तरायन शब्द का संधि विग्रह न कर समास विग्रह करें तो उत्तरा के गर्भ में अयन किया जिसने वह उत्तरायण है। परीक्षित को अश्वत्थामा के ब्रम्हास्त्र से बचाने भगवान उत्तरा के गर्भ में गये तो वे ही उत्तरायण हो गए, भीष्म जी ने सभी अर्थों भगवान को पा लिया। 


Shrimad Bhagwat Mahapuran, God in person - Pt. Manoj Pandey

Champa - Late of Champa, the city of Kosa, Kansa and Kanchan. Late by Kesarwani family at Jeevanlal Sao Community Hall. Srimad Bhagwat Katha Gyan Yagya is being organized for the annual Shraddha of Devkumari Kesarwani ji, where while detailing the story of the third day, revered Byaspeeth Pandit Manoj Pandey ji said that it is the form of Shri Krishnaji, the form of a lamp for the welfare of the living beings languishing in the darkness of ignorance. This book was revealed. Bhagwat ji's place in 18 Puranas is paramount. This is the essence of all the Puranas. When Parikshit ji was in his mother's womb, Brahmastra was used on him. Lord Shri Krishna granted permission. When Parikshit became the king and put a dead snake around the neck of a Brahmin in the fence, he was cursed to die within 7 days. Due to the curse of the saint and death due to snake bite, the soul has to go to hell. But Parikshit was freed after listening to God's story. Parikshit is a living being. It is Takshak period. If the living beings want to escape from the trials of time, then they should take shelter of God's story. The description of Bhishma Pitamah ji's demise is very amazing. If a living being remembers the name of God in his last moments, he gets well-being. Bhishma ji should leave his body after seeing God directly, saluting and praising him. And the time at the time of death was also very good. Uttarayan, Maghamas, Shukla Paksha and Ashtami Tithi. But this type of combination is difficult for all living beings. The secret of Bhishma ji going to Uttarayan is as follows, there are 6 months of Uttarayan and 6 months of Dakshinayan in a year. Dying in Uttarayan is considered best. The period of life in which a person lives a sinful life is Dakshinayan, and the period in which he lives a virtuous life is Uttarayan. We all should always be aware that Dakshinayan should never enter our lives and if death ever occurs, the welfare of the living being will be achieved. If we use compound analysis of the word Uttarayan instead of Sandhi analysis, then Ayan was formed in the womb of Uttara which is Uttarayan. When Lord Uttara entered the womb of Lord Uttara to save Parikshit from Ashwatthama's Brahmastra, he himself became Uttarayan, Bhishma ji attained God in all senses.

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