22 वें तीर्थंकर प्रभु श्री नेमिनाथ भगवान का जन्मोत्सव मनाया | 22 ve tirthkar prabhu shri neminath bhagwan ka janmotsav manaya

22 वें तीर्थंकर प्रभु श्री नेमिनाथ भगवान का जन्मोत्सव मनाया

ज्ञान से विरती आती है: मुनि पीयूषचन्द्रविजय

22 वें तीर्थंकर प्रभु श्री नेमिनाथ भगवान का जन्मोत्सव मनाया

राजगढ़/धार (संतोष जैन) - आज श्रावण सुदी पंचमी को 22 वें तीर्थंकर प्रभु श्री नेमिनाथ भगवान का जन्मकल्याणक है । माता शिवा देवी एवं राजा समुद्रविजयजी के घर सौरीपुरी नगरी में प्रभु का जन्म हुआ था । समकित के बाद भवों की गणना होती है । आज शुक्रवार को श्री महावीरजी मंदिर में विराजित प्रभु श्री नेमिनाथ भगवान की प्रतिमा पर गच्छाधिपति आचार्यदेवेश श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. के शिष्यरत्न मुनिराज श्री पीयूषचन्द्रविजयजी म.सा. एवं मुनिराज श्री जनकचन्द्रविजयजी म.सा. की निश्रा में जन्मकल्याणक निमित्ते वर्धमान शक्रस्तव महाअभिषेक श्री अनिलकुमारजी मनोहरलालजी खजांची परिवार द्वारा किया गया । राजगढ़ नगर की यह प्रतिमा 2200 वर्ष प्राचीन है । पूर्व चौविसी के तीसरे श्री सागरतीर्थंकरजी के समयकाल में सौधर्मेन्द्र ने श्री नेमिनाथ भगवान की प्रतिमा गिरनार तीर्थ के पर्वत पर भरवायी  थी । यह प्रतिमा रत्न प्रतिमा है । श्री सागरतीर्थंकर के समय में अपनी आत्मा की मुक्ति के उद्देश्य से यह प्रतिमा गिरनार तीर्थ में विराजित की गयी थी । नेमिनाथ भगवान के 9 भव हुऐ है नवमें भव में उन्हें मुक्ति प्राप्त हुई थी । ज्ञान है तभी विरती आती है संत सर्वविरती धर्म में होता है और सामायिक के रुप में बैठे श्रावक-श्राविका देश विरती धर्म में होते है । इस अवसर पर मुनिराज श्री जनकचन्द्रविजयजी म.सा. ने कहा कि जैन दर्शन में चातुर्मास के चार माह ही महत्वपूर्ण बताये गये है । वर्ष के बारह माह में से इन चार माह में की गयी धर्म आराधना व्यक्ति के जीवन में बहुत लाभकारी मानी गयी है । हमें अपनी आत्मा के समीप में रह कर इसे हमेशा जागृत करने का प्रयास करना है । संसार असार है और यही परिभ्रमण का कारण है । इस परिभ्रमण से मुक्ति प्राप्त करने के लिये हमें देव गुरु और धर्म की शरण लेना जरुरी है । यही तीन तत्व आत्मा को गलत मार्ग पर जाने से बचा सकते है । संसार त्यागने जैसा है और संयम जीवन ग्रहण करने जैसा है । हम परमात्मा की वाणी श्रवण कर रहे है । इस वाणी को श्रवण करके जीवन के आचरण में लाना होगा तभी आत्मा का कल्याण सम्भव होगा । 

22 वें तीर्थंकर प्रभु श्री नेमिनाथ भगवान का जन्मोत्सव मनाया

राजगढ़ श्रीसंघ में मुनिश्री की प्रेरणा से नियमित प्रवचन वाणी का श्रवण कर श्रीमती पिंकी सुमितजी गादिया राजगढ़ ने अपनी आत्मा के कल्याण की भावना से महामृत्युंजय तप प्रारम्भ किया था, आज उनका 22 वां उपवास है । नमस्कार महामंत्र की आराधना मुनिश्री पीयूषचन्द्रविजयजी म.सा. की निश्रा में आज से श्रीसंघ में प्रारम्भ होगी ।

Post a Comment

0 Comments