आखिर कौन हैं करवा माता, इस त्योहार का नाम कैसे पड़ा करवा चौथ

किस तरह करवा चौथ व्रत की हुई थी शुरुआत

आखिर कौन हैं करवा माता, इस त्योहार का नाम कैसे पड़ा करवा चौथ

डिंडौरी (पप्पू पड़वार) - भारतीय महिलाओं के लिए करवा चौथ का व्रत सबसे महत्वपूर्ण होता है। क्योंकि यह व्रत अखंड सौभाग्य की प्राप्ति और पति की लंबी उम्र की कामना करते हुए किया जाता है। द्वापर युग से लेकर कलयुग तक यह पर्व उतनी आस्था और विश्वास से किया जाता है, जैसा द्वापर युग में किया जाता है। आज सुहागन महिलाएं सर्वार्थ सिद्धि योग और शिव योग में इस व्रत को करेंगी। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि करवा चौथ के दिन जिसकी पूजा करते हैं, आखिर वह करवा माता कौन हैं और किस तरह से उनके नाम पर करवा चौथ की शुरुआत हुई। 

आखिर कौन हैं करवा माता, इस त्योहार का नाम कैसे पड़ा करवा चौथ

 कौन थी मां करवा

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में एक करवा नाम की पतिव्रत स्त्री थी। उनका पति काफी उम्रदराज था। एक दिन वह नदी में स्नान करने गया है तो नहाते समय एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ा लिया और निगलने के लिए खींचने लगा। उसने चिल्लाकर अपनी पत्नी करवा को बुलाया और सहायता के लिए कहने लगा। करवा बहुत पतिव्रता था, जिससे उसकी सतीत्व में काफी बल थी।

करवा पहुंची यमलोक

करवा नदी के तट पर अपने पति के पास पहुंचकर सूती साड़ी से धागा निकालकर अपने तपोबल के माध्यम से उस मगरमच्छ को अपने तपोबल के माध्यम से बांध दिया। सूत के धागे से बांधकर करवा मगरमच्छ को लेकर यमराज के पास पहुंची। यमराज ने करवा से पूछा कि हे देवी आप यहां क्या कर रही हैं और आप चाहती क्या हैं।

करवा ने यमराज से की विनती

करवा ने यमराज से कहा कि इस मगर ने मेरे पति के पैर को पकड़ लिया था इसलिए आप अपनी शक्ति से इसके मृत्युदंड दें और उसको नरक में ले जाएं। यमराज ने करवा से कहा कि अभी इस मगर की आयु शेष हैं इसलिए वह समय से पहले मगर को मृत्यु नहीं दे सकते। इस पर करवा ने कहा कि अगर आप मगर को मारकर मेरे पति को चिरायु का वरदान नहीं देंगे तो मैं अपने तपोबल के माध्यम से आपको ही नष्ट कर दूंगी।

चित्रगुप्त ने करवा को दिया आशीर्वाद

करवा की बात सुनकर यमराज के पास खड़े चित्रगुप्त सोच में पड़ गए क्योंकि करवा के सतीत्व के कारण ना तो वह उसको शाप दे सकते थे और ना ही उसके वचन को अनदेखा कर सकते थे। तब उन्होंने मगर को यमलोक भेज दिया और उसके पति को चिरायु का आशीर्वाद दे दिया। साथ ही चित्रगुप्त ने करवा को आशीर्वाद दिया कि तुम्हारा जीवन सुख-समृद्धि से भरपूर होगा।

इस तरह हुई करवा चौथ की शुरुआत

चित्रगुप्त ने कहा कि जिस तरह तुमने अपने तपोबल से अपने पति के प्राणों की रक्षा की है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हूं। मैं वरदान देता हूं कि आज की तिथि के दिन जो भी महिला पूर्ण विश्वास के साथ तुम्हारा व्रत और पूजन करेगी, उसके सौभाग्य की रक्षा मैं करूंगा। उस दिन कार्तिक मास की चतुर्थी होने के कारण करवा और चौथ मिलने से इसका नाम करवा चौथ पड़ा। इस तरह मां करवा पहली महिला हैं, जिन्होंने सुहाग की रक्षा के लिए न केवल व्रत किया बल्कि करवा चौथ की शुरुआत भी की।

इन्होंने किया था सबसे पहला व्रत

करवा चौथ के व्रत को करने के बाद शाम को पूजा करते समय माता करवा चौथ कथा पढ़ना चाहिए। साथ ही माता करवा से विनती करनी चाहिए कि हे मां, जिस प्रकार आपने अपने सुहाग और सौभाग्य की रक्षा की उसी तरह हमारे सुहाग की आप रक्षा करें। साथ ही यमराज और चित्रगुप्त से विनति करें कि वह अपना व्रत निभाते हुए हमारे व्रत को स्वीकार करें और हमारे सौभाग्य की रक्षा करें। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर द्रौपदी ने भी इस व्रत को किया था, जिसका उल्लेख वारह पुराण में मिलता है।