महाशक्ति के नवरात्री पर्व प्रारम्भ, शक्तिपीठ माँ जयंती के दरबार मे उमड़ा भक्तो का जन सैलाब | Mahashakti ke navratri parv prarambh

महाशक्ति के नवरात्री पर्व प्रारम्भ, शक्तिपीठ माँ जयंती के दरबार मे उमड़ा भक्तो का जन सैलाब


बड़वाह (गोविंद शर्मा) - मध्यप्रदेश के बडवाह से तीन किमी दूर वनक्षेत्र मे विंध्याचल पर्वत की प्राकृतिक सुरम्य हसीन वादियों मे चोरल नदी के किनारे जेतगढ़ पहाड़ पर गुफा में स्वयम्भू विराजित माता जयंती का अतिप्राचीन मंदिर  है। भक्तो की मुरादे पूरी करने वाली माता के दिन मे तीन स्वरूपो मे दर्शन होते हैं,, सुबह माता बाल स्वरूप कन्या के रूप में दर्शन देती है तो दोपहर में माता युवा रूप में नजर आती है वही माता संध्या के समय  प्रौढ़ रूप व्रद्ध स्वरूप में दर्शन देती हैं।

माता मन्दिर से करीब पांच सौ मीटर की दूरी पर स्वयम्भू विराजित चमत्कारी भैरव बाबा का प्राचीन मंदिर भी माँ जयन्ती के प्रकट होने के समय का है।

निमाड़-मालवा व म.प्र.के सहित राजस्थान गुजरात महाराष्ट्र आदि प्रांतों से माता के दरबार मे हजारो भक्त दर्शन करते आते हैं। आस्था से आये भक्तगणों की माता व भैरव बाबा के दरबार मे माँगी गई हर मान मन्नत मुरादे पूरी होती है।

नवरात्रि पर्व के दौरान यहां भव्य मेला लगता है,जिसमे फूल प्रसादी चुनरी,,बच्चों के खेल खिलौने व खादय सामग्री की दुकान सजती है। माता के भक्तगण माता के दरबार मे गहरी आस्थाओ के साथ बड़वाह से 3 किमी पैदल चलकर आते हैं।। माता का दरबार वनक्षेत्र मे विराजित होने के कारण व्यवस्थाओं व जंगली वन्यप्राणियो से भक्तो की सुरक्षा को दृष्टिगत रखते हुए राजस्व,पुलिस एव वन विभाग का अमला दिन रात तैनात रहता है।।

माता की दिन में तीनों प्रहरों में आरती होती हैं जिसमे प्रातःआरती सुबह 5:30 बजे, दोपहर भोग आरती 12 बजे व संध्या शयन आरती रात्रि 9 बजे होती है,वर्षो से चली आ रही परम्परानुसार माता के शयन के लिये शयन आरती के समय पालना सजाया जाता है,पहले यह पालना लकड़ी का होता था अब यह पीतल धातु का है।

पाँच पीढ़ियों से पीढ़ी दर पीढ़ी मन्दिर मे पूजा अर्चना करते आ रहे आता मन्दिर के पुजारी पंडित रामस्वरूप शर्मा कहते हैं कि महाभारत मे उल्लेख है की माँ जयन्ती पाडवो की कुलदेवी रही है,,, विंध्याचल और सतपुड़ा पर्वतों पर पाडवो ने पूरा जीवन व्यतीत कर 12 वर्ष का वनवास  काटा था,,उस दौरान माता का नित्य पूजन अर्चन किया करते थे। 

दुर्गा सप्तसती मे भी माता जयंती का पहला ही श्लोक "ॐजयंती मंगला काली भद्रकाली कृपालंनी" दुर्गा शमा शिवाधात्री स्वाह सुधा नमस्तुते" से आता है,,,, माता के 108 सिद्धपीठो मे एक सिद्ध पीठ  माता जयन्ती का उल्लेखित है,,पंडित रामस्वरूप बताते है माता जयन्ती स्वयं पिंडी के रूप में प्रकट हुई थी,,माता की भव्य पिंडी वर्तमान समय मे बहुत ही छोटे रूप में होकर,आज भी दर्शनीय है, माता का पिंडी स्वरूप धीरे - धीरे माता की प्रतिमा में समाता जा रहा है,,,

कुछ वर्षों पूर्व जीर्णोद्वार के समय मन्दिर की दीवार पर एक प्राचीनकाल का शिलालेख लगा हुआ निकला था, जिसमे 1351 सवत मे होलकर वंश के राजाओ द्वारा मन्दिर के जीर्णोद्वार का उल्लेख होना दर्शाता गया है,, इसके अनुसार पहाड़ पर स्थित माता का यह मन्दिर पाण्डवकाल के पूर्व का होना प्रतीत होता है,,माता राणा परिवार की भी कुलदेवी है।।

माता मन्दिर से करीब पांच सौ मीटर की दूरी पर चमत्कारी भैरव बाबा का प्राचीन मंदिर भी माँ जयन्ती के प्रकट होने के समय का स्थित है।।आस्था से आये भक्तगणों की माता व भैरव बाबा के दरबार मे माँगी गई हर मन्नत पूरी होती है।

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