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| रीवा-मऊगंज में नशीली कफ सिरप और प्रतिबंधित दवाओं की कथित सप्लाई पर सवाल |
रीवा। रीवा एवं मऊगंज जिले में नशीली कफ सिरप, गोलियों और अन्य प्रतिबंधित दवाओं के कथित अवैध कारोबार को लेकर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर इन पदार्थों की उपलब्धता और सीमावर्ती इलाकों में संभावित आपूर्ति नेटवर्क की जांच की मांग की जा रही है। हालांकि, संबंधित क्षेत्रों में अवैध भंडारण और वितरण के दावों की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है।
रीवा जिले की उत्तरी सीमा उत्तर प्रदेश से लगती है। चाकघाट, सोहागी, गढ़, कटरा, घूमा, लालगांव, हिनौती तथा डभौरा-हनुमना से जुड़े क्षेत्रों को लेकर स्थानीय स्तर पर नशीली दवाओं की कथित उपलब्धता और आपूर्ति संबंधी चर्चाएं सामने आती रही हैं। ऐसे में यह पता लगाना जरूरी है कि कहीं नियंत्रित दवाओं की बिक्री और वितरण नियमों के विरुद्ध तो नहीं हो रहा। प्रशासनिक जांच से ही इन चर्चाओं की वास्तविकता स्पष्ट हो सकेगी।
भंडारण से लेकर सप्लाई तक जांच की जरूरत
स्थानीय स्तर पर कुछ स्थानों पर नशीली कफ सिरप और गोलियों के कथित भंडारण की आशंका जताई जा रही है। इन दावों की पुष्टि के लिए पुलिस और औषधि विभाग को दवा विक्रेताओं के लाइसेंस, खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड, थोक आपूर्तिकर्ताओं तथा परिवहन से जुड़े दस्तावेजों की जांच करनी चाहिए। यदि किसी अवैध नेटवर्क के प्रमाण मिलते हैं, तो उसके स्रोत से लेकर अंतिम वितरण तक की कड़ियों की पड़ताल आवश्यक होगी।
यह मामला केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है। नशीले पदार्थों का दुरुपयोग युवाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा और भविष्य पर गंभीर असर डाल सकता है। इसलिए शिकायतों का समय पर सत्यापन और प्रमाण मिलने पर नियमानुसार कार्रवाई जरूरी है।
बीट प्रभारियों की जवाबदेही पर भी सवाल
किसी क्षेत्र में संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी जुटाने और वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचाने में स्थानीय पुलिस तथा बीट प्रभारियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे में यदि किसी इलाके से लगातार शिकायतें मिलती हैं, तो संबंधित क्षेत्र की निगरानी व्यवस्था और पुलिस के सूचना तंत्र की समीक्षा की जानी चाहिए।
हालांकि, केवल शिकायतों के आधार पर किसी पुलिसकर्मी की संलिप्तता या लापरवाही साबित नहीं होती। इसकी पुष्टि उपलब्ध साक्ष्यों और निष्पक्ष जांच से ही हो सकती है। यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की गंभीर लापरवाही अथवा संलिप्तता प्रमाणित होती है, तो उसके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
पुराने मामलों की समीक्षा भी जरूरी
लालगांव और हिनौती सहित कुछ क्षेत्रों में लंबे समय से अवैध गतिविधियां जारी रहने के दावे भी स्थानीय चर्चाओं में सामने आते हैं। कुछ दावों में ऐसी गतिविधियों की अवधि करीब तीन दशक बताई जाती है, लेकिन इसकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। प्रशासन पुराने प्रकरणों, दर्ज शिकायतों, जब्ती की कार्रवाई और न्यायालयीन रिकॉर्ड की समीक्षा कर स्थिति स्पष्ट कर सकता है।
पुलिस और औषधि विभाग के समन्वय पर जोर
नशीली कफ सिरप और प्रतिबंधित दवाओं के अवैध कारोबार पर नियंत्रण के लिए पुलिस के साथ औषधि विभाग का समन्वय महत्वपूर्ण है। संदिग्ध खरीद-बिक्री, नियमों के विरुद्ध भंडारण और अवैध परिवहन की जांच से संभावित नेटवर्क का पता लगाया जा सकता है। शिकायतकर्ताओं की सुरक्षा और उनकी पहचान की गोपनीयता का ध्यान रखना भी जरूरी है।
इस मामले में पुलिस और संबंधित विभागों का विस्तृत आधिकारिक पक्ष फिलहाल सामने नहीं आया है। ऐसे में आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि सीमावर्ती क्षेत्रों में अवैध सप्लाई हो रही है, तो उसका स्रोत क्या है और वितरण की कड़ियां कहां तक पहुंचती हैं? पारदर्शी जांच, विभागीय समन्वय और प्रमाणों के आधार पर कार्रवाई से ही स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
