जन विश्वास शिविर में भी नहीं मिला न्याय तो आखिर किसके लिए है सत्ता का विश्वास?

जन विश्वास शिविर में भी नहीं मिला न्याय तो आखिर किसके लिए है सत्ता का विश्वास?

रीवा। मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार को लंबे समय से सत्ता संभाले हुए कई वर्ष हो चुके हैं। सरकार लगातार सुशासन, जनकल्याण और समाज के अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने का दावा करती है। लेकिन रीवा जिले के मंडल लालगांव अंतर्गत ग्राम पंचायत गढ़ में आयोजित मुख्यमंत्री जन विश्वास समस्या निवारण शिविर में सामने आई एक ग्रामीण की समस्या इन दावों के सामने कई गंभीर सवाल खड़े करती है।

मामला ऐसे ग्रामीण का है, जो कथित तौर पर वर्षों से अपनी समस्या के समाधान के लिए तहसीलदार से लेकर एसडीओ, कलेक्टर, पूर्व विधायक और वर्तमान विधायक तक के चक्कर लगा चुका है। इसके बावजूद यदि समस्या का समाधान नहीं हुआ है तो सवाल केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस पूरी प्रशासनिक व्यवस्था का है, जिसके माध्यम से सरकार आम नागरिक तक न्याय और योजनाओं का लाभ पहुंचाने का दावा करती है।

वर्षों से कार्यालयों के चक्कर, फिर भी समाधान नहीं

ग्रामीण की समस्या जमीन और उससे जुड़े सरकारी दस्तावेजों तथा योजनाओं से संबंधित बताई जा रही है। स्थिति यह है कि उसका केसीसी नहीं बन पा रहा और फार्मर रजिस्ट्री नहीं होने के कारण खाद एवं कृषि संबंधी सुविधाओं का लाभ भी प्रभावित हो रहा है।

किसान के लिए जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि उसकी आजीविका का आधार है। यदि दस्तावेजी प्रक्रिया की समस्या के कारण किसान बैंकिंग सुविधा, केसीसी, खाद और अन्य कृषि योजनाओं से ही दूर हो जाए तो यह प्रशासनिक संवेदनशीलता पर सवाल खड़ा करता है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब एक व्यक्ति अपनी समस्या लेकर बार-बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के पास पहुंच चुका हो, तब भी समाधान क्यों नहीं हुआ? क्या विभागों के बीच समन्वय की कमी है या फिर शिकायतों के निराकरण की व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित है?

‘अंतिम व्यक्ति’ तक पहुंचने के दावे पर सवाल

भाजपा सरकार लगातार यह संदेश देती रही है कि शासन की योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाया जाएगा। मुख्यमंत्री जन विश्वास जैसे अभियान भी इसी उद्देश्य से जुड़े हैं। ऐसे में यदि शिविर में पहुंचने वाला व्यक्ति यह कहने को मजबूर हो कि वह वर्षों से अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के चक्कर लगा रहा है, तो सरकार के सामने आत्ममंथन का अवसर है।

सवाल भाजपा संगठन से भी है। संगठन का दावा है कि उसके कार्यकर्ता बूथ स्तर तक मौजूद हैं और जनता की समस्याओं को सरकार तक पहुंचाने का काम करते हैं। फिर ऐसी समस्याएं वर्षों तक लंबित कैसे रह जाती हैं?

कार्यकर्ता भी अगर परेशान हैं तो संवाद कहां है?

यह स्थिति केवल जनता तक सीमित नहीं मानी जा सकती। यदि सत्ताधारी दल के स्थानीय कार्यकर्ता और पदाधिकारी भी प्रशासनिक स्तर पर समस्याओं के समाधान के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो यह संगठन और सरकार के बीच जमीनी संवाद की स्थिति पर भी विचार करने का विषय है।

सत्ता का वास्तविक मूल्य तभी है, जब आम नागरिक को सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने के बजाय समय पर समाधान मिले। जनप्रतिनिधि और अधिकारी जनता के बीच सेतु की भूमिका निभाते हैं। यदि यह सेतु कमजोर पड़ जाए तो योजनाएं और घोषणाएं होने के बावजूद उनका वास्तविक लाभ अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंच पाएगा।

भाजपा संगठन क्या करेगा आत्ममंथन?

रीवा के गढ़ में सामने आया यह मामला किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष का मुद्दा मात्र नहीं है। यह प्रशासनिक जवाबदेही और नागरिक के अधिकार से जुड़ा प्रश्न है।

भाजपा संगठन को गंभीरता से विचार करना होगा कि क्या उसके कार्यकर्ता वास्तव में ग्रामीणों की समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचा पा रहे हैं? क्या अधिकारी शिकायतों का समयबद्ध निराकरण कर रहे हैं? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या मुख्यमंत्री जन विश्वास जैसे शिविरों के बाद वास्तव में लोगों की समस्याएं खत्म होती हैं या केवल आवेदन दर्ज होकर फाइलों में चली जाती हैं?

सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती भाषणों में ‘अंतिम व्यक्ति’ तक पहुंचना नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की वास्तविक समस्या का समाधान करना है। जिस किसान को केसीसी और फार्मर रजिस्ट्री के लिए वर्षों तक भटकना पड़े, उसके लिए जन विश्वास का अर्थ तभी बनेगा, जब शिविर के बाद उसे न्याय भी मिले।

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