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| महंगाई की मार: शक्कर से लेकर किसान तक, आखिर किसकी जेब पर कितना बोझ? |
रीवा - महंगाई की चर्चा अब सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं रही। इसका असर सीधे आम आदमी की रसोई और किसान की खेती पर दिखाई दे रहा है। शक्कर, तेल, मसाले, लहसुन और अन्य जरूरी वस्तुओं के बढ़ते दामों ने निम्न और मध्यम वर्ग का घरेलू बजट बिगाड़ दिया है।
स्थानीय बाजार से मिल रही जानकारी के अनुसार करीब तीन महीने पहले लगभग ₹45 किलो मिलने वाली शक्कर अब करीब ₹75 किलो तक पहुंच गई है। कुछ क्षेत्रों में इससे भी अधिक कीमत की शिकायतें हैं। वहीं गुड़ के दाम भी करीब ₹60 से बढ़कर 85 किलो बताए जा रहे हैं।
महंगाई केवल शक्कर तक सीमित नहीं है। उपभोक्ताओं के अनुसार सरसों तेल करीब ₹140 से बढ़कर ₹180, , खुला 200 रूपए/ लीटर जीरा ₹300 से ₹400 और लहसुन करीब ₹100 से बढ़कर ₹250 किलो तक पहुंच गया है। डालडा और अन्य घरेलू सामानों के दामों में भी बढ़ोतरी की शिकायतें सामने आ रही हैं। हालांकि स्थानीय बाजार के इन भावों का स्वतंत्र थोक मंडी स्तर पर सत्यापन उपलब्ध नहीं है। गांवों में शक्कर गुड़ का रेट और अधिक महंगा मिल रहा है
त्योहारों पर पड़ सकता है असर
राखी और दीपावली जैसे त्योहार सामने हैं। चीनी महंगी होने का सीधा असर मिठाइयों की लागत पर पड़ सकता है। ऐसे में उपभोक्ताओं को आने वाले दिनों में त्योहारों का खर्च भी बढ़ता दिखाई दे रहा है।
किसान की लागत बढ़ी, उपज का भाव सवालों में
महंगाई की दूसरी तस्वीर खेत में दिखाई देती है। किसानों का कहना है कि खाद, बीज, कीटनाशक, डीजल और मजदूरी की लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन उनकी उपज के भाव में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं हो रही। ग्रामीण क्षेत्रों में गेहूं करीब ₹2400 प्रति क्विंटल के आसपास मिलने की चर्चा है, जबकि चना और मसूर के भाव में भी अपेक्षित वृद्धि नहीं होने की शिकायतें हैं। यही सबसे बड़ा सवाल है—जब उपभोक्ता महंगा सामान खरीद रहा है तो उत्पादक किसान को उसका उचित लाभ क्यों नहीं मिल रहा?
सरकार के सामने दोहरी चुनौती
चीनी की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार की ओर से आयात और स्टॉक नियंत्रण जैसे कदम उठाए जाने की जानकारी है। लेकिन केवल आदेश पर्याप्त नहीं हैं। जरूरत है कि थोक से खुदरा बाजार तक कीमतों और स्टॉक की निगरानी हो, ताकि जमाखोरी, कृत्रिम कमी या अनुचित मुनाफे की स्थिति न बने। उपभोक्ताओं की शिकायत है कि कीमत बढ़ते ही बाजार भाव तुरंत बढ़ जाता है, लेकिन कीमत घटने पर उसका लाभ ग्राहक तक देर से पहुंचता है। इस अंतर की निगरानी भी जरूरी है। महंगाई का वास्तविक समाधान तभी संभव है जब उपभोक्ता को उचित कीमत, किसान को उचित मूल्य और व्यापारी को पारदर्शी एवं उचित लाभ मिले।
यह रिपोर्ट स्थानीय उपभोक्ताओं, ग्रामीण जनचर्चा और उपलब्ध बाजार जानकारी पर आधारित है। प्रस्तुत खुदरा भावों का स्वतंत्र थोक मंडी स्तर पर सत्यापन उपलब्ध नहीं है। समाचार का उद्देश्य किसी व्यक्ति या व्यापारी पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि जनता की आवाज को सरकार और प्रशासन तक पहुंचाना है। सवाल सिर्फ शक्कर के दाम का नहीं—सवाल आम आदमी की थाली और किसान की कमाई का है।
