आजादी का जश्न और एक सेनानी की विदाई: जिस स्वतंत्रता के लिए जेल गए, उसी दिन पंचतत्व में विलीन हुए जवाहर सिंह

आजादी का जश्न और एक सेनानी की विदाई: जिस स्वतंत्रता के लिए जेल गए, उसी दिन पंचतत्व में विलीन हुए जवाहर सिंह

रीवा - रीवा में स्वतंत्रता दिवस पर एक ऐसा दृश्य सामने आया, जिसने देशभक्ति के जश्न को भावुक कर दिया। 15 अगस्त को जब पूरा देश आजादी का 80वां पर्व मना रहा था, उसी दिन जवा तहसील के डोरी-भितरी गांव ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जवाहर सिंह को अंतिम विदाई दी। आजादी की लड़ाई में जेल जाने वाले इस सेनानी को पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम सलामी दी गई। स्वतंत्रता सेनानी जवाहर सिंह ने 1932 के राष्ट्रीय आंदोलन में हिस्सा लिया था, जिसके चलते उन्हें छह महीने जेल और 100 रुपये जुर्माने की सजा भुगतनी पड़ी। इसके बाद 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन और नमक आंदोलन में भी उन्होंने योगदान दिया। आजादी के बाद भी उनका जीवन देश और समाज के प्रति समर्पित रहा। बताया जाता है कि उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी सम्मान निधि लेने से भी शुरुआत में इनकार कर दिया था। उनका कहना था कि यह राशि जनहित और देशहित में खर्च होनी चाहिए। 15 अगस्त को उनके निधन के बाद अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में ग्रामीण उमड़े। सिरमौर विधायक दिव्यराज सिंह, राजमणि सिंह पटेल सहित जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने पुष्पचक्र अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। पुलिस जवानों ने गार्ड ऑफ ऑनर देकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को अंतिम सलामी दी।बड़े पुत्र कमल नारायण सिंह ने मुखाग्नि दी। अंतिम संस्कार के दौरान पूरा माहौल गम और देशभक्ति के भाव से भर गया। एक तरफ देश तिरंगे के साथ आजादी का जश्न मना रहा था, दूसरी तरफ डोरी-भितरी में उसी आजादी के एक सिपाही की अंतिम यात्रा निकल रही थी—जिसने कभी इसी आजादी के लिए जेल की सलाखें झेली थीं। जवाहर सिंह की विदाई, स्वतंत्रता आंदोलन की उस पीढ़ी को अंतिम सलाम थी, जिसने देश के लिए अपना आज कुर्बान कर दिया।



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