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| आरक्षण पर सवाल नहीं, उसके लाभ के बंटवारे पर सवाल: क्या अंतिम व्यक्ति तक पहुँच रही सामाजिक न्याय की रोशनी? |
रीवा/मऊगंज - आजादी के सात दशकों से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी देश में सामाजिक और आर्थिक विषमता एक गंभीर चुनौती के रूप में खड़ी है। भारतीय संविधान निर्माताओं ने अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के उत्थान के लिए आरक्षण जैसी दूरदर्शी व्यवस्था लागू की थी। इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य स्पष्ट था—जो वर्ग सदियों से सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से हाशिए पर धकेल दिए गए थे, उन्हें मुख्यधारा में लाया जाए और बराबरी के अवसर दिए जाएं। लेकिन आज के समय में एक मौलिक और न्यायसंगत सवाल पूछना बेहद जरूरी हो गया है: क्या सामाजिक न्याय का यह लाभ वास्तव में उस समाज के अंतिम, बेबस और जरूरतमंद व्यक्ति तक पहुँच पा रहा है?
एक ही वर्ग, दो अलग तस्वीरें
आज यदि हम जमीनी हकीकत का अवलोकन करें, तो आरक्षित वर्गों के भीतर ही दो स्पष्ट और परस्पर विरोधी तस्वीरें नजर आती हैं:
पहली तस्वीर: उस वर्ग की है जो आरक्षण का लाभ उठाकर आर्थिक, शैक्षणिक और प्रशासनिक रूप से बेहद मजबूत स्थिति में पहुँच चुका है। जिनके परिवार की दो-तीन पीढ़ियां उच्च पदों, राजनीति और व्यापार में स्थापित हो चुकी हैं।
दूसरी तस्वीर: उसी वर्ग के उस बहुसंख्यक हिस्से की है, जो आज भी अपने बच्चों की प्राथमिक शिक्षा, रोजगार, पक्के मकान और दो वक्त की बुनियादी जरूरतों के लिए कड़ा संघर्ष कर रहा है।
ऐसे में सवाल आरक्षण के औचित्य या उसे खत्म करने का बिल्कुल नहीं है, बल्कि सवाल यह है कि आरक्षण के लाभ को अधिक न्यायपूर्ण, पारदर्शी और लक्ष्यपरक (Targeted) कैसे बनाया जाए?
बराबरी के भीतर असमानता की चुनौती
यदि किसी परिवार को आरक्षण के बल पर सामाजिक और आर्थिक संबल मिल चुका है और उनकी स्थिति कई पीढ़ियों में सुदृढ़ हो गई है, तो क्या उसी परिवार को लगातार हर पीढ़ी में वही प्राथमिकता मिलती रहनी चाहिए, जो आज भी किसी अत्यंत गरीब और साधनहीन परिवार को मिलनी चाहिए? यह सवाल किसी विशेष वर्ग या जाति के खिलाफ नहीं है, बल्कि हर वर्ग के भीतर पैदा हो रही आंतरिक असमानता को दूर करने की एक ईमानदार पहल है। साथ ही, यह स्वीकार करना होगा कि 'सामान्य वर्ग' (Unreserved Category) भी कोई एक एकरूप आर्थिक इकाई नहीं है। हर समुदाय और जाति में गरीब, मध्यमवर्गीय और साधनहीन परिवार मौजूद हैं। इसलिए, सामाजिक न्याय की भावी नीतियों पर किसी भी प्रकार के राजनीतिक या जातीय पूर्वाग्रह से ऊपर उठकर एक गंभीर संवैधानिक और बौद्धिक बहस की आवश्यकता है।
संसद और सरकार के समक्ष यक्ष प्रश्न
सरकार और संसद को अब इस विषय पर दूरगामी नीति बनाने की दिशा में विचार करना चाहिए:
आरक्षण की मूल भावना और संवैधानिक सुरक्षा पूरी तरह अक्षुण्ण रहे।
लेकिन इसके लाभ की बारंबारता (Repetition) को इस प्रकार विनियमित किया जाए कि पहली बार लाभ पाने वाले और अत्यंत गरीब परिवारों को प्राथमिकता मिले।
लाभ का दायरा 'क्रीमी लेयर' या 'आंतरिक वर्गीकरण' के जरिए वास्तव में जरूरतमंदों तक सीमित करने का पारदर्शी तंत्र बने।
निष्कर्ष: सामाजिक न्याय का वास्तविक अर्थ
सामाजिक न्याय केवल कागजों पर दर्ज अधिकारों या चुनावी घोषणापत्रों के वादों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसकी वास्तविक सफलता तब सिद्ध होगी, जब किसी सुदूर गांव के उस गरीब बच्चे तक भी अवसर पहुँचेंगे, जिसके पास न तो राजनीतिक प्रभाव है, न आर्थिक संसाधन और न ही शासन-प्रशासन तक पहुँच। आरक्षण रहे, अधिकार पूरी तरह सुरक्षित रहें—लेकिन लाभ की पहली प्राथमिकता उस व्यक्ति को मिले जिसे उसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। यही 21वीं सदी के भारत में सामाजिक न्याय की अगली और सबसे बड़ी बहस होनी चाहिए।
