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| रीवा संभाग में गांजा तस्करी और अवैध कारोबार की जड़ें कितनी गहरी? 'तू डाल-डाल, मैं पात-पात' की कहावत हो रही चरितार्थ |
रीवा - संभाग में इन दिनों नशे के विरुद्ध विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं। पुलिस और प्रशासन समय-समय पर गांजा, मादक पदार्थ और अवैध नशीले पदार्थों की खेप पकड़कर कार्रवाई भी कर रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल छोटी-मोटी जब्तियां ही नशे के इस संगठित नेटवर्क को समाप्त कर पाएंगी? स्थानीय स्तर पर प्राप्त जानकारियां और वर्षों से चले आ रहे कारोबार की चर्चा इस ओर संकेत करती हैं कि गांजे का अवैध व्यापार एक संगठित तंत्र के रूप में कार्य कर रहा है। "तू डाल-डाल, मैं पात-पात" की कहावत इस अवैध कारोबार पर सटीक बैठती दिखाई देती है। एक ओर प्रशासन कार्रवाई करता है तो दूसरी ओर तस्कर और विक्रेता अपने तौर-तरीकों में बदलाव कर कारोबार को आगे बढ़ाते रहते हैं।
सदियों पुराना नशा, बदलते हैं केवल तरीके
गांजे का सेवन कोई नई बात नहीं है। साधु-संतों के बीच धार्मिक अनुष्ठानों से लेकर समाज के विभिन्न वर्गों तक इसका सेवन लंबे समय से देखने को मिलता रहा है। वर्तमान समय में इसका स्वरूप पूरी तरह व्यावसायिक हो चुका है। स्थानीय स्तर पर गांजे की अलग-अलग किस्मों को "कलीदार", "नगीना", "मिर्चइया" और "भूरिया" जैसे नामों से जाना जाता है। बताया जाता है कि "भूरिया" नाम से पहचानी जाने वाली किस्म स्थानीय स्तर पर भी तैयार की जाती रही है।
कैसे चलता है अवैध कारोबार?
स्थानीय सूत्रों के अनुसार, गांजे का कारोबार कई चरणों में संचालित होता है। पहले यह छोटी-छोटी पुड़ियों में पान की दुकानों और गुमटियों के माध्यम से बेचा जाता था, लेकिन तकनीक और संचार के इस दौर में अब इसकी आपूर्ति मोबाइल संपर्क और मोटरसाइकिलों के माध्यम से भी की जा रही है। बताया जाता है कि बड़ी खेपों को पहले चुनिंदा स्थानों पर उतारा जाता है, जिसके बाद छोटे विक्रेताओं के माध्यम से इसे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाया जाता है। जब कभी बड़ी मात्रा में गांजे की खेती या खेप पकड़ी जाती है तो उसके पीछे आपसी व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा, विवाद अथवा मुखबिरी जैसी वजहें भी सामने आने की चर्चाएं होती हैं।
मऊगंज और आसपास के क्षेत्रों को लेकर चर्चाएं
स्थानीय स्तर पर प्राप्त सूचनाओं के अनुसार, रीवा और नवीन मऊगंज जिले के कुछ क्षेत्रों को गांजे की अवैध आपूर्ति के प्रमुख पड़ावों के रूप में देखा जाता रहा है। इनमें मऊगंज, सुरसा, चाक हनुमान, बैकुंठपुर, सेमरिया, अतरैला और पटेहरा, मंगवान जैसे क्षेत्रों के नाम चर्चाओं में सामने आते हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र प्रशासनिक पुष्टि नहीं हुई है। सूत्र बताते हैं कि बड़ी खेपें ट्रक अथवा पिकअप वाहनों के माध्यम से पहुंचाई जाती हैं, जिसके बाद इन्हें छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर विभिन्न थाना क्षेत्रों तक भेजा जाता है। रीवा/माऊगंज ग्रामीण अंचलो पर हर थाना क्षेत्र पर फुटकर विक्रेता कार्य कर रहे है।
कहां से आता है गांजा?
स्थानीय स्तर पर वर्षों से इस कारोबार से जुड़े लोगों द्वारा यह दावा किया जाता रहा है कि गांजे की आपूर्ति पड़ोसी राज्यों और सीमावर्ती क्षेत्रों से होती है। इसमें उड़ीसा, छत्तीसगढ़, बिहार, पश्चिम बंगाल तथा नेपाल सीमा से जुड़े क्षेत्रों के नाम सामने आते हैं। यह भी चर्चा है कि विभिन्न राज्यों से आने वाली खेप की गुणवत्ता और कीमत में भी अंतर होता है। थोक इन प्रान्तों से 1500रु से लेकर 2000रु किलो मिलता है ट्रांपोर्टिंग सहित बीस हजार रुपये मिलाता है फिर चालीस हजार के बाद फुटकर नशा प्रेमियों तक साठ से सत्तर हजार तक पहुचता है।
करोड़ों के कारोबार की आशंका
सूत्रों के अनुसार, गांजे की कीमत आपूर्ति स्थल से लेकर खुदरा बाजार तक कई गुना बढ़ जाती है। स्थानीय स्तर पर यह दावा किया जाता है कि एक किलो गांजा खरीद से लेकर खुदरा बिक्री तक कई हाथों से गुजरता है और प्रत्येक स्तर पर उसका मूल्य बढ़ता जाता है। परिणामस्वरूप अवैध कारोबार में बड़ी आर्थिक गतिविधि होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
पुलिस-प्रशासन पर भी उठते हैं सवाल
नशे के इस कारोबार को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि यह इतना व्यापक है तो फिर यह वर्षों से कैसे संचालित हो रहा है? स्थानीय स्तर पर यह आरोप भी लगाए जाते रहे हैं कि कहीं न कहीं भ्रष्ट तत्वों की मिलीभगत के बिना इस प्रकार का संगठित अवैध व्यापार संभव नहीं है। हालांकि ऐसे आरोपों की पुष्टि सक्षम जांच एजेंसियों द्वारा ही की जा सकती है। कुछ जानकारों का कहना है कि यदि विशेष अभियान चलाकर खुफिया स्तर पर जांच की जाए तो न केवल गांजे की अवैध आपूर्ति श्रृंखला का खुलासा हो सकता है बल्कि अन्य संगठित आपराधिक गतिविधियों पर भी प्रभावी कार्रवाई संभव है।
महामारी का रूप लेता नशा
सबसे चिंताजनक बात यह है कि गांजे और अन्य नशीले पदार्थों का सेवन अब केवल सीमित वर्ग तक नहीं रह गया है। युवा वर्ग तक इसकी पहुंच बढ़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है। यदि समय रहते प्रभावी और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई तो यह सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी गंभीर चुनौती बन सकता है।
केंद्र और राज्य सरकारों से अपेक्षा
देश में नशा मुक्ति को लेकर केंद्र और राज्य सरकारें लगातार अभियान चला रही हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि नशे के स्रोत, आपूर्ति श्रृंखला, अवैध कारोबार में शामिल तत्वों तथा उनके संरक्षण से जुड़े पहलुओं की निष्पक्ष और गोपनीय जांच कराई जाए। केवल छोटी कार्रवाई या फुटकर विक्रेताओं की गिरफ्तारी से इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं होगा। (अस्वीकरण : यह समाचार स्थानीय स्रोतों, जनसूचनाओं और क्षेत्रीय चर्चाओं पर आधारित पड़ताल स्वरूप तैयार किया गया है। इसमें वर्णित आरोपों और दावों की स्वतंत्र प्रशासनिक पुष्टि होना शेष है। किसी व्यक्ति, संस्था या अधिकारी के विरुद्ध आरोपों की पुष्टि सक्षम जांच एजेंसियों द्वारा ही की जा सकती है।
