निजी स्कूलों की मनमानी पर सवाल: फीस वसूली, शिक्षकों के शोषण और बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़! आखिर कब जागेगा प्रशासन?

निजी स्कूलों की मनमानी पर सवाल: फीस वसूली, शिक्षकों के शोषण और बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़! आखिर कब जागेगा प्रशासन?

रीवा/मऊगंज - शिक्षा को सेवा और संस्कार का माध्यम माना जाता है, लेकिन रीवा और मऊगंज जिले के कई निजी विद्यालयों की कार्यप्रणाली को लेकर लगातार गंभीर सवाल उठ रहे हैं। अभिभावकों से विभिन्न शीर्षकों के नाम पर मनमाने तरीके से शुल्क वसूले जाने, शिक्षकों को निर्धारित मानदेय नहीं दिए जाने और स्कूली बच्चों को असुरक्षित वाहनों में क्षमता से कई गुना अधिक संख्या में बैठाकर परिवहन किए जाने जैसी शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि स्थानीय समाचार पत्रों और सामाजिक संगठनों द्वारा इन मुद्दों को बार-बार उठाए जाने के बावजूद जिम्मेदार विभागों की ओर से कोई ठोस और व्यापक कार्रवाई दिखाई नहीं दे रही है।

शिक्षा से जुड़े लोगों का आरोप है कि कई निजी विद्यालयों में वार्षिक उत्सव, भवन विकास शुल्क, स्मार्ट क्लास, सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेलकूद, कंप्यूटर शुल्क, परिवहन शुल्क तथा अन्य विभिन्न मदों के नाम पर अभिभावकों से अतिरिक्त राशि वसूली जा रही है। कई मामलों में अभिभावकों का कहना है कि निर्धारित शुल्क के अतिरिक्त भी विभिन्न कारणों से आर्थिक बोझ डाला जाता है, जिससे मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ रहा है।

इसी के साथ कई निजी विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आए हैं। बताया जा रहा है कि कई संस्थानों में शिक्षकों को बैंक खाते के माध्यम से नियमित वेतन देने के बजाय नगद रूप से दो से तीन हजार रुपये देकर औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं। यदि इन शिकायतों में तथ्य पाए जाते हैं, तो यह न केवल श्रम कानूनों और शिक्षा विभाग के नियमों का उल्लंघन होगा, बल्कि शिक्षकों के आर्थिक शोषण का भी गंभीर मामला माना जाएगा। शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि जो शिक्षक स्वयं आर्थिक असुरक्षा में काम कर रहे हों, उनसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की अपेक्षा करना भी कठिन है।

बच्चों की सुरक्षा पर सबसे बड़ा सवाल

पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पक्ष स्कूली बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। रीवा और मऊगंज जिले के शहरों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक बड़ी संख्या में ऑटो, टेंपो और छोटे व्यावसायिक वाहनों में निर्धारित क्षमता से कई गुना अधिक बच्चों को बैठाकर स्कूल पहुंचाया जा रहा है। कई स्थानों पर तीन पहिया वाहनों में 25 से 35 बच्चों तक को बैठाकर परिवहन किए जाने की तस्वीरें आम बात बन चुकी हैं।

ऐसे में कई महत्वपूर्ण सवाल उठ रहे हैं—

  • क्या इन वाहनों का बीमा स्कूल परिवहन के लिए वैध है?
  • क्या इन वाहनों के पास फिटनेस प्रमाणपत्र और परमिट नियमों के अनुरूप हैं?
  • क्या वाहन चालक निर्धारित योग्यता और लाइसेंस रखते हैं?
  • क्या विद्यालय प्रबंधन परिवहन संबंधी सुरक्षा मानकों का पालन कर रहा है?
  • क्या परिवहन विभाग द्वारा नियमित जांच अभियान चलाए जा रहे हैं?

यदि किसी दिन ऐसी लापरवाही के कारण कोई बड़ा हादसा हो जाता है, तो उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?

सीसीटीवी में कैद हो रही हैं तस्वीरें, फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं?

रीवा और मऊगंज के प्रमुख चौराहों, बाजारों और मुख्य मार्गों पर लगे सीसीटीवी कैमरे प्रतिदिन इन ओवरलोड स्कूल वाहनों की आवाजाही रिकॉर्ड करते हैं। इसके बावजूद यदि क्षमता से अधिक बच्चों को ले जाने वाले वाहनों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो रही है तो यह संबंधित विभागों की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। लोगों का कहना है कि यदि तकनीकी संसाधन उपलब्ध हैं, तो उनका उपयोग नियमों के पालन के लिए भी होना चाहिए।

जिम्मेदार विभागों की भूमिका पर उठ रहे सवाल

शिक्षा विभाग, परिवहन विभाग और पुलिस प्रशासन की संयुक्त जिम्मेदारी है कि वे समय-समय पर निजी विद्यालयों, उनके परिवहन साधनों और शुल्क व्यवस्था की जांच करें। लेकिन अभिभावकों का आरोप है कि शिकायतों के बावजूद कार्रवाई अक्सर कागजों तक ही सीमित रह जाती है। ऐसे में आमजन के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या संबंधित विभाग अपनी जिम्मेदारी पूरी गंभीरता से निभा रहे हैं?

जनप्रतिनिधियों और विपक्ष की चुप्पी भी चर्चा में

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा की गुणवत्ता और अभिभावकों पर बढ़ता आर्थिक बोझ किसी राजनीतिक दल का विषय नहीं बल्कि समाज के भविष्य का प्रश्न है। ऐसे में क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों और विपक्षी दलों को भी इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाना चाहिए। यदि जनता की मूलभूत समस्याओं पर भी जनप्रतिनिधि मौन रहेंगे तो लोकतांत्रिक जवाबदेही पर भी सवाल उठेंगे।

प्रशासन से उठ रही प्रमुख मांगें

अभिभावकों और सामाजिक संगठनों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि—

  • जिले के सभी निजी विद्यालयों के शुल्क ढांचे की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए।
  • शिक्षकों के वेतन भुगतान और सेवा शर्तों का विशेष ऑडिट कराया जाए।
  • सभी स्कूल परिवहन वाहनों का व्यापक सत्यापन अभियान चलाया जाए।
  • क्षमता से अधिक बच्चों को ले जाने वाले वाहनों पर तत्काल कार्रवाई की जाए।
  • प्रत्येक विद्यालय को परिवहन सुरक्षा संबंधी सभी मानकों का अनिवार्य रूप से पालन कराने के निर्देश दिए जाएं।
  • अभिभावकों के लिए प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र विकसित किया जाए।
  • नियमों का उल्लंघन करने वाले विद्यालयों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

बच्चों की सुरक्षा से बड़ा कोई मुद्दा नहीं

शिक्षा केवल आधुनिक भवनों, आकर्षक विज्ञापनों और ऊंची फीस से गुणवत्तापूर्ण नहीं बनती। इसके लिए पारदर्शी प्रशासन, प्रशिक्षित शिक्षक, सुरक्षित परिवहन और अभिभावकों का विश्वास सबसे महत्वपूर्ण होता है। यदि विद्यालयों में मनमानी शुल्क वसूली हो रही है, शिक्षकों का आर्थिक शोषण हो रहा है और बच्चों को असुरक्षित वाहनों में सफर करने के लिए मजबूर किया जा रहा है, तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि समाज के भविष्य के साथ गंभीर खिलवाड़ है। अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या रीवा और मऊगंज जिला प्रशासन इन गंभीर शिकायतों का स्वतः संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच करेगा और दोषियों पर कार्रवाई करेगा, या फिर किसी बड़े हादसे के बाद ही व्यवस्था की नींद टूटेगी? अभिभावकों का कहना है कि उन्हें अब आश्वासन नहीं, बल्कि सुरक्षित शिक्षा व्यवस्था और जवाबदेह प्रशासन चाहिए।

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