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| मनगवां तहसील में हाई कोर्ट के आदेशों की उड़ी धज्जियां; पूर्व अधिवक्ता संघ अध्यक्ष का आरोप—नेताओं के रसूख के आगे झुका प्रशासन |
रीवा/मनगवां - जिला कलेक्टर नरेंद्र सूर्यवंशी की जन चौपाल के ठीक बाद अब मनगवां तहसील परिसर से एक बड़ा प्रशासनिक और कानूनी विवाद सामने आया है। तहसील परिसर के अंतर्गत मलकपुर तालाब क्षेत्र में माननीय उच्च न्यायालय (High Court) के स्थगन आदेश (Stay Order) की सरेआम धज्जियां उड़ाने का एक सनसनीखेज मामला उजागर हुआ है। पूर्व अध्यक्ष अधिवक्ता संघ मनगवां, प्रभात चंद्र द्विवेदी ने स्थानीय प्रशासन और राजनेताओं के गठजोड़ पर कोर्ट की अवमानना (Contempt of Court) का सीधा और गंभीर आरोप लगाया है।
तालाब की जमीन पर भारी निर्माण, नए कामों पर था 'स्टे' अधिवक्ता प्रभात चंद्र द्विवेदी के अनुसार, मलकपुर तालाब क्षेत्र में स्थित मनगवां तहसील परिसर के भीतर पहले ही आईटीआई कॉलेज, अस्पताल, एसडीएम कार्यालय, मंडी, मजिस्ट्रेट कोर्ट और ऑफिसर्स क्वार्टर जैसी कई इमारतें डूब क्षेत्र में खड़ी कर दी गई हैं। तालाब की भूमि पर हो रहे इस लगातार अतिक्रमण को देखते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने यहां किसी भी प्रकार के नवीन निर्माण कार्य पर पूरी तरह से स्थगन आदेश (स्टे) जारी किया था।
वकीलों के शेड पर कानून का डंडा, अधिकारियों की बाउंड्री को हरी झंडी? अधिवक्ता संघ के पूर्व अध्यक्ष ने स्थानीय प्रशासन के दोहरे मापदंड और भेदभावपूर्ण रवैये को उजागर करते हुए तीखे सवाल दागे हैं। उन्होंने कहा, "हाई कोर्ट के इसी स्थगन आदेश का हवाला देकर तत्कालीन तहसीलदार सुमित गुप्ता ने तहसील परिसर में अधिवक्ताओं (वकीलों) के बैठने के शेड और दूर-दराज से आने वाले पक्षकारों के प्रतीक्षालय का निर्माण कार्य रुकवा दिया था। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि इसी 'स्टे' के प्रभावी रहते हुए माननीय मजिस्ट्रेट महोदय की बाउंड्री वॉल का निर्माण करा दिया गया, जो सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन है।" इतना ही नहीं, उन्होंने बताया कि इसी प्रतिबंधित परिसर में अस्पताल का निर्माण कार्य भी पूरा कर उसका लोकार्पण तक करवा दिया गया।
क्या राजनेताओं का रसूख माननीय हाई कोर्ट से भी बड़ा है? यह मामला तब और गरमा गया जब परिसर के भीतर आईटीआई भवन की बाउंड्री और एक पुलिया का निर्माण कार्य गुपचुप तरीके से दोबारा शुरू करा दिया गया। अधिवक्ता द्विवेदी ने बताया कि इस अवैध निर्माण के संबंध में उन्होंने वर्तमान तहसीलदार मनगवां, आंचल अग्रहरी को लिखित और मौखिक तौर पर सूचित किया था। शिकायत के बाद तहसीलदार ने काम रोकने के लिए स्थगन तो जारी किया, लेकिन कुछ ही समय बाद किसी अज्ञात दबाव में निर्माण कार्य फिर से धड़ल्ले से शुरू हो गया। पूर्व अध्यक्ष ने प्रशासनिक संलिप्तता पर सवाल खड़े करते हुए पूछा कि क्या किसी राजनेता या राजनीतिक दबाव के आगे तहसीलदार ने अपने ही आदेश को ठंडे बस्ते में डाल दिया? सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस देश में नेताओं का दबाव, माननीय हाई कोर्ट के आदेशों से भी ऊपर हो चुका है?
'तहसीलदार के संरक्षण में हो रहा अवैध खेल, तुरंत लगे रोक' प्रभात चंद्र द्विवेदी ने दोटूक शब्दों में आरोप लगाया कि यदि हाई कोर्ट का स्थगन आदेश समाप्त हो चुका होता, तो सबसे पहले वकीलों के बैठने के शेड का निर्माण भी शुरू होना चाहिए था। लेकिन वकीलों के काम को ठप रखकर सिर्फ आईटीआई भवन और पुलिया का 'एकपक्षीय निर्माण' किया जाना यह साबित करता है कि परदे के पीछे कोई बड़ा खेल चल रहा है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यह पूरा निर्माण कार्य राजनीतिक दबाव के कारण और स्थानीय तहसीलदार के सीधे संरक्षण में किया जा रही है, जो पूरी तरह अवैध है। अधिवक्ता संघ ने इस पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने और कोर्ट के आदेश का सम्मान करने की मांग की है।
प्रशासनिक साख पर सवाल एक तरफ जहां जिला कलेक्टर रीवा में जन-विश्वास बहाल करने के लिए 'बस' में अमला लेकर घूम रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ तहसील स्तर पर हाई कोर्ट के आदेशों की यह खुली अनदेखी और वकीलों के साथ किया जा रहा भेदभाव जिला प्रशासन की साख पर बड़े सवालिया निशान खड़े करता है।
