लोकायुक्त के ताबड़तोड़ 'ट्रैप' से भी नहीं हिले भ्रष्टाचार के 'अंगद के पांव'; फाइलों पर बिना 'वजन' नहीं सरकती कलम! Aajtak24 News

लोकायुक्त के ताबड़तोड़ 'ट्रैप' से भी नहीं हिले भ्रष्टाचार के 'अंगद के पांव'; फाइलों पर बिना 'वजन' नहीं सरकती कलम! Aajtak24 News

रीवा/मऊगंज - पुरानी कहावत है कि हांडी का एक चावल ही पूरी हांडी का हाल बयां कर देता है। रीवा और नवनिर्वाचित जिला मऊगंज सहित पूरे विंध्य संभाग में इन दिनों लोकायुक्त पुलिस की बैक-टू-बैक कार्रवाइयां इस कहावत को पूरी तरह चरितार्थ कर रही हैं। हर दूसरे दिन घूस लेते रंगे हाथों पकड़े जा रहे सरकारी नुमाइंदे मध्य प्रदेश सरकार के 'पारदर्शिता' और 'जीरो टॉलरेंस' के दावों की सरेआम पोल खोल रहे हैं। लोकायुक्त के आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि संभाग का शायद ही कोई ऐसा सरकारी महकमा बचा हो, जहां भ्रष्टाचार रूपी 'अंगद के पांव' न जमे हों। सवाल यह है कि क्या इन अंगद के पांवों को उखाड़ने वाला कोई ताकतवर तंत्र मौजूद है? फिलहाल धरातल पर इसका जवाब 'ना' में ही नजर आता है।

विभागों में 'सेवा शुल्क' का खुला खेल: सीमांकन से लेकर संगीन केस तक

संभाग में लोकायुक्त की रडार पर सबसे ज्यादा तीन विभाग हैं—राजस्व, पुलिस और पंचायत।

  1. राजस्व विभाग: यहाँ सीमांकन और नामांतरण के नाम पर जमीनों की सीमाएं इधर से उधर की जा रही हैं। गरीब किसान अपनी ही पैतृक जमीन को बचाने के लिए सरकारी बाबुओं को 'सेवा शुल्क' (रिश्वत) देने को मजबूर हैं।

  2. पुलिस महकमा: रक्षक ही भक्षक की भूमिका में नजर आ रहे हैं। खाकी पर आरोप हैं कि झूठे मुकदमों में फंसाने की धमकी और फिर उससे बचाने के नाम पर टेबल के नीचे से मोटी डील की जा रही है।

  3. पंचायत और महिला बाल विकास: आंगनबाड़ी के पोषण आहार से लेकर ग्राम पंचायतों में निर्माण कार्यों के मूल्यांकन तक, हर फाइल बिना 'वजन' रखे आगे नहीं बढ़ती।

जनचर्चा का कड़वा सच: 20% से 25% का 'फिक्स कमीशन राज'?

विंध्य की गलियों और प्रशासनिक गलियारों में यह जनचर्चा आम है कि विकास कार्यों का कमीशन पहले से तय है। चर्चाओं के मुताबिक, मिट्टी के कार्यों में 25% और कंक्रीट (निर्माण) के कार्यों में 20% का कमीशन फिक्स है। बात यहीं खत्म नहीं होती, जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली 'स्वेच्छा अनुदान निधि' की राशि पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। यदि इस निधि की निष्पक्ष जांच कराई जाए कि जिस जनहित के कार्य के लिए राशि जारी हुई, वह धरातल पर कितनी उतरी, तो एक बड़ा घोटाला उजागर हो सकता है।

लेकिन, आलोचकों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सब जांच केवल कागजी बनकर रह जाएगी। क्योंकि वर्तमान राजनीति का फोकस सनातन धर्म, मंदिर-मस्जिद और भारत-पाकिस्तान के मुद्दों पर ज्यादा है, जिसके लाउडस्पीकर वाले शोर में आम जनता से जुड़ा यह बुनियादी और रोजमर्रा का भ्रष्टाचार आसानी से छिप जाता है।

नीचे नहीं, 'ऊपर' से जवान हुआ भ्रष्टाचार!

कहा जाता है कि भ्रष्टाचार हमेशा गंगोत्री की तरह ऊपर से नीचे की तरफ बहता है। जब शीर्ष पर बैठे तंत्र की पकड़ ढीली होती है, तो निचले स्तर पर बैठे बाबू और मैदानी अधिकारी पूरी तरह बेखौफ हो जाते हैं। आज देश के प्रशासनिक इतिहास का यह भ्रष्टाचार विंध्य में पूरी तरह जवान हो चुका है। लोकायुक्त की छोटी-मोटी ट्रैप कार्रवाइयां तो हो रही हैं, लेकिन अभी तक विंध्य क्षेत्र में किसी बड़े सफेदपोश जनप्रतिनिधि या शीर्ष स्तर के प्रशासनिक सिंडिकेट पर कोई बड़ा प्रहार नहीं हुआ है, जिससे इस भ्रष्ट तंत्र की जड़ें हिल सकें।

कलेक्टर का खौफ: क्या बदलेगी रीवा-मऊगंज की तस्वीर?

इस पूरे व्यवस्थागत अंधकार के बीच, वर्तमान रीवा जिला कलेक्टर की पदस्थापना के बाद प्रशासनिक हलकों में एक अलग तरह की सुगबुगाहट और छटपटाहट देखी जा रही है। उनके कड़े रुख और औचक दौरों के कारण हर विभाग के लापरवाह और भ्रष्ट कर्मचारियों में एक किस्म की 'दहशत' व्याप्त है। फाइलों को समय पर निपटाने और नियमों के पालन की कवायद शुरू तो हुई है, लेकिन सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि—यह प्रशासनिक खौफ और कसावट कितने दिनों तक टिक पाएगी? क्या यह केवल शुरुआती 'नई-नई नौ दिन की मोहलत' है या फिर रीवा-मऊगंज की पीड़ित जनता को वास्तव में इस रिश्वतखोरी के मकड़जाल से हमेशा के लिए मुक्ति मिलेगी? यह तो आने वाला वक्त ही तय करेगा, लेकिन फिलहाल जनता तमाशा देख रही है और भ्रष्ट तंत्र अंदर ही अंदर रास्ते निकाल रहा है।

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