सोशल मीडिया पर जजों को बदनाम करने का मामला; अरविंद केजरीवाल समेत AAP के 6 नेताओं पर आपराधिक अवमानना का मुकदमा शुरू

सोशल मीडिया पर जजों को बदनाम करने का मामला; अरविंद केजरीवाल समेत AAP के 6 नेताओं पर आपराधिक अवमानना का मुकदमा शुरू

नई दिल्ली: दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। अब उनके खिलाफ अदालत की अवमानना की एक और बड़ी कानूनी कार्यवाही शुरू हो चुकी है। दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के आदेश पर अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, राज्यसभा सांसद संजय सिंह, दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री सौरभ भारद्वाज, आप नेता दुर्गेश पाठक और विनय मिश्रा के खिलाफ आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) के मुकदमे की सुनवाई शुरू कर दी गई है।

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने लिया स्वतः संज्ञान

यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने स्वतः संज्ञान लेते हुए 'आप' के इन शीर्ष नेताओं के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया। इस आदेश पर आगे बढ़ते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रवींद्र डुडेजा की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की और सभी नामजद 'आप' नेताओं को औपचारिक नोटिस जारी किया। अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि कथित अवमानना करने वाले नेताओं को नोटिस मिलने की तारीख से चार सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करना होगा। पीठ ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 4 अगस्त की तारीख मुकर्रर की है।

क्या है पूरा विवाद और क्यों दर्ज हुआ केस?

मामले की जड़ें दिल्ली के चर्चित कथित आबकारी नीति (शराब घोटाले) से जुड़ी हुई हैं। दरअसल, जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत इस मामले की सुनवाई कर रही थी, जिससे अरविंद केजरीवाल उन्हें अलग करना चाहते थे। जब अदालत ने केजरीवाल की इस याचिका को खारिज कर दिया, तो उसके बाद कथित तौर पर आम आदमी पार्टी के कई नेताओं ने जस्टिस शर्मा पर सोशल मीडिया के जरिए सीधे और गंभीर आरोप लगाए।

जस्टिस शर्मा के मुताबिक, अरविंद केजरीवाल ने उनके फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का कानूनी रास्ता चुनने के बजाय, उन्हें व्यक्तिगत रूप से बदनाम करने की नीयत से सोशल मीडिया पर एक सुनियोजित और प्रायोजित अभियान चलाया। इस अभियान के तहत जज के कुछ वीडियो को भी एडिट (संपादित) करके दुर्भावनापूर्ण तरीके से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर साझा किया गया, जिससे न्यायपालिका की छवि को गंभीर चोट पहुंची।

क्या होती है आपराधिक अवमानना और इसमें कितनी सजा है?

कानूनी विशेषज्ञों और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकीलों के अनुसार, अदालती अवमानना मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है—सिविल और क्रिमिनल। कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट ऐक्ट, 1971 के तहत इसे स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 215 के तहत हाई कोर्ट को और अनुच्छेद 129 के तहत सुप्रीम कोर्ट को अवमानना की कार्यवाही करने और सजा देने का विशेषाधिकार प्राप्त है।

  • सिविल अवमानना: यह तब बनती है जब कोई व्यक्ति अदालत के किसी आदेश या डिक्री को मानने से जानबूझकर इनकार करता है या उसमें देरी करता है।

  • क्रिमिनल (criminal) अवमानना: यह तब लागू होती है जब कोई व्यक्ति या समूह कोर्ट को नीचा दिखाने, उसकी गरिमा को ठेस पहुँचाने, न्यायिक कार्यवाही में सीधे तौर पर दखलअंदाजी करने या पूरी न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करने का प्रयास करता है।

सजा का प्रावधान: आपराधिक अवमानना का दोषी पाए जाने पर कानून में अधिकतम छह महीने तक के साधारण कारावास (जेल) या आर्थिक जुर्माने, अथवा जेल और जुर्माना दोनों का प्रावधान है। हालांकि, यदि अभियुक्त बिना शर्त अदालत से लिखित माफी मांगता है और अदालत उसकी नीयत से पूरी तरह संतुष्ट हो जाती है, तो उसे माफ करने का अधिकार भी जज के पास सुरक्षित रहता है। लेकिन 'आप' नेताओं के इस मामले में अब गेंद पूरी तरह से अदालत के पाले में है।

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