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| दंतेवाड़ा; अब संगठन में ही घमासान: माओवादियों ने अपने ही साथियों को बताया ‘दुश्मन का एजेंट’ Aajtak24 News |
दंतेवाड़ा - दंतेवाड़ा में प्रतिबंधित माओवादी संगठन की नॉर्थ कोऑर्डिनेशन कमेटी (NCC) द्वारा जारी एक ताजा प्रेस विज्ञप्ति ने संगठन के भीतर गहरे वैचारिक मतभेदों को फिर उजागर कर दिया है। इस बयान में आत्मसमर्पण कर चुके नेताओं और विशेषकर “देवजी” पर सीधा हमला करते हुए उन्हें “समर्पणवादी” और “संशोधनवादी” करार दिया गया है। संगठन ने आरोप लगाया है कि ऐसे तत्व विचारधारा को कमजोर करने और संगठन को खत्म करने की दिशा में काम कर रहे हैं, जिसे उन्होंने “लिक्विडेशनिज्म” बताया है।
विज्ञप्ति में यह भी स्पष्ट किया गया है कि संगठन अपनी पुरानी रणनीति पर कायम है और भारत जैसे देशों में परिवर्तन का रास्ता केवल “सशस्त्र संघर्ष” ही है। माओवादियों ने गुरिल्ला युद्ध को आगे बढ़ाने और “जन सत्ता” की स्थापना की अपनी पुरानी नीति को फिर दोहराया है। इसके साथ ही संगठन ने खुली या कानूनी राजनीति में किसी भी तरह की भागीदारी को पूरी तरह खारिज करते हुए भूमिगत ढांचे में काम जारी रखने की बात कही है।
आत्मसमर्पण करने वाले सदस्यों पर तीखा हमला करते हुए कहा गया कि अब उनका संगठन से कोई संबंध नहीं है और वे “दुश्मन ताकतों के एजेंट” के रूप में काम कर रहे हैं। संगठन ने यह भी दावा किया कि उनके भीतर कोई वास्तविक टूट नहीं है, बल्कि यह केवल वैचारिक संघर्ष है, जैसा पहले भी नक्सल आंदोलन के इतिहास में देखा गया है। सुरक्षा एजेंसियां इस बयान को गंभीरता से देख रही हैं, क्योंकि इससे क्षेत्र में गतिविधियां और तेज होने की आशंका जताई जा रही है।
आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सीधे सवाल
- अगर संगठन में कोई विभाजन नहीं है, तो फिर लगातार आत्मसमर्पण करने वाले वरिष्ठ सदस्य क्यों “दुश्मन एजेंट” घोषित किए जा रहे हैं? क्या यह आंतरिक असहमति का खुला प्रमाण नहीं है?
- “सशस्त्र संघर्ष” को ही एकमात्र रास्ता बताना—क्या यह सीधे तौर पर हिंसा को वैचारिक वैधता देने का प्रयास नहीं माना जाना चाहिए, और क्या इससे युवाओं के फिर भटकने का खतरा नहीं बढ़ेगा?
- जब संगठन खुद को “जनता की सत्ता” का समर्थक बताता है, तो फिर खुले राजनीतिक और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को पूरी तरह खारिज करने का आधार क्या है?
