दुर्ग, गन्ने के साथ अब ‘एनर्जी क्रांति’ की खेती!” – गोढ़ी में शुगरबीट ने बढ़ाई उम्मीद Aajtak24 News

दुर्ग, गन्ने के साथ अब ‘एनर्जी क्रांति’ की खेती!” – गोढ़ी में शुगरबीट ने बढ़ाई उम्मीद Aajtak24 News

दुर्ग - छत्तीसगढ़ में वैकल्पिक ऊर्जा और कृषि नवाचार को बढ़ावा देने की दिशा में एक अहम कदम के तहत छत्तीसगढ़ बायोफ्यूल विकास प्राधिकरण (सीबीडीए), रायपुर द्वारा राष्ट्रीय शर्करा संस्थान (एनएसआई), कानपुर के सहयोग से ग्राम गोढ़ी स्थित बायोफ्यूल कॉम्प्लेक्स में किसान सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में कवर्धा, बेमेतरा और दुर्ग जिलों के गन्ना उत्पादक किसानों सहित कृषि विभाग के अधिकारी बड़ी संख्या में शामिल हुए। कार्यक्रम में वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने किसानों को गन्ना आधारित खेती में शुगरबीट (सफेद चुकंदर) को अंतरफसली के रूप में अपनाने के लाभों की विस्तृत जानकारी दी।

कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण उस समय रहा जब खेतों में उगाई गई शुगरबीट की खुदाई की गई, जिसमें एक कंद का औसत वजन लगभग 3.7 किलोग्राम पाया गया। विशेषज्ञों ने इसे इस तकनीक की सफलता का स्पष्ट संकेत बताया और कहा कि इससे भविष्य में बायोएथेनॉल उत्पादन के लिए कच्चे माल की उपलब्धता मजबूत होगी। किसानों ने इस अवसर पर शुगरबीट के लिए सुनिश्चित मूल्य निर्धारण और मजबूत विपणन व्यवस्था की मांग भी उठाई, ताकि फसल को व्यावसायिक रूप से अपनाने में किसी प्रकार की अनिश्चितता न रहे।

सीबीडीए के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री सुमित सरकार ने बताया कि संस्था राज्य में बायोडीजल, बायोएथेनॉल, कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे ऊर्जा विकल्पों को बढ़ावा देने के लिए लगातार कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि गन्ना जैसी दीर्घकालीन फसल के बीच खाली भूमि का बेहतर उपयोग शुगरबीट जैसी अल्पकालिक फसलों से किया जा सकता है, जिससे किसानों की आय में सीधा इजाफा होगा।

एनएसआई कानपुर की निदेशक डॉ. सीमा परोहा ने कहा कि यह मॉडल किसानों के लिए आय बढ़ाने का व्यावहारिक और वैज्ञानिक विकल्प है। उन्होंने बताया कि राजस्थान, पंजाब, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में इसके सफल प्रयोग हो चुके हैं और अब छत्तीसगढ़ में भी इसके सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। डॉ. लोकेश बाबर ने किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन देते हुए कहा कि शुगरबीट कम लागत में अधिक उत्पादन देने वाली फसल है और एनएसआई द्वारा किसानों को बीज एवं प्रशिक्षण दोनों उपलब्ध कराए जाएंगे।

कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि शुगरबीट की खेती लगभग 5 से 6 महीने में तैयार हो जाती है और इसे गन्ने के साथ अंतरफसल के रूप में अपनाकर भूमि उपयोग दक्षता को कई गुना बढ़ाया जा सकता है। इससे न केवल कृषि उत्पादन बढ़ेगा बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में बायोएथेनॉल उद्योग को भी नई ऊर्जा मिलेगी। सम्मेलन के दौरान विशेषज्ञों ने सीबीडीए परिसर में हर्बेरियम, आर्बोरेटम और नेपियर घास आधारित सीबीजी उत्पादन संभावनाओं का भी अवलोकन किया।

अंत में किसानों और अधिकारियों को सम्मान स्वरूप गमछा एवं टोपी प्रदान कर कार्यक्रम का समापन किया गया। इस पहल को राज्य में कृषि और ऊर्जा क्षेत्र के बीच एक नए “ग्रीन इकोनॉमी मॉडल” के रूप में देखा जा रहा है।

आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल

  1. शुगरबीट की खेती अभी परीक्षण स्तर पर है, तो क्या किसानों के लिए इसका न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) या सुनिश्चित खरीद प्रणाली तैयार किए बिना इसे आगे बढ़ाना जोखिम भरा नहीं है?
  2. बायोएथेनॉल उत्पादन की बड़ी बात हो रही है, लेकिन क्या राज्य में इसके लिए पर्याप्त प्रोसेसिंग और इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है या यह अभी भी केवल प्रयोगात्मक स्तर पर है?
  3. अगर शुगरबीट सफल हो भी जाता है, तो क्या छोटे किसानों के लिए बीज, तकनीक और बाजार तक समान पहुंच सुनिश्चित करने की कोई स्पष्ट नीति तैयार की गई है?

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