
उज्जैन; परिवार दिखावे की चीज नहीं, सबसे बड़ा संबल है” — विश्व परिवार दिवस पर उज्जैन में भावुक चर्चा Aajtak24 News
उज्जैन - आनंद विभाग द्वारा विश्व परिवार दिवस के अवसर पर उज्जैन में “परिवार : संवाद, संस्कार और संबंध” विषय पर विशेष परिचर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम में वक्ताओं ने आधुनिक जीवनशैली, सोशल मीडिया और डिजिटल संस्कृति के बीच कमजोर होते पारिवारिक रिश्तों पर चिंता जताते हुए परिवार को समाज की सबसे मजबूत इकाई बताया। कार्यक्रम में वरिष्ठ शिक्षाविद् डॉ. स्वामीनाथ पांडे ने कहा कि व्यक्ति की भलाई का सबसे बड़ा प्रमाण पत्र उसका परिवार होता है। उन्होंने कहा कि परिवार केवल दिखावे की वस्तु नहीं, बल्कि हमारी पहचान, विश्वास और जीवन का सबसे बड़ा सहारा है।
वहीं जीवाजीराव वैधशाला के अधीक्षक डॉ. राजेंद्र गुप्त ने कहा कि परिवार दिवस मनाने की आवश्यकता पड़ना ही इस बात का संकेत है कि आधुनिक समाज में पारिवारिक मूल्य कमजोर हो रहे हैं। उन्होंने इसे पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से जोड़ते हुए आत्ममंथन की जरूरत बताई। राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त स्वामी मुस्कुराके ने अपने सहज और प्रेरणादायी संबोधन में कहा कि “सात वार होते हैं, लेकिन परिवार नहीं तो सात वार का भी कोई महत्व नहीं।” उन्होंने कहा कि पहले जो गंदगी समाज में बाहर दिखाई देती थी, वह अब घरों के भीतर पहुंच गई है। उन्होंने लोगों से रिश्तों को “रिप्लाई और रिएक्शन” से ऊपर उठकर समझने की अपील की।
स्वामी मुस्कुराके ने कहा कि आज के दौर में हीरे की परख करने वालों से ज्यादा जरूरत पीड़ा को समझने वालों की है। उन्होंने यह भी कहा कि गूगल और सोशल मीडिया के आने के बाद परिवारों की सोच और स्वरूप दोनों तेजी से बदल गए हैं। कार्यक्रम संयोजक एवं आनंद विभाग के जिला समन्वयक डॉ. प्रवीण जोशी ने कहा कि डिजिटल युग में जानकारी हर जगह उपलब्ध है, लेकिन परिवार केवल ज्ञान से नहीं बल्कि साथ, संवेदना और आत्मीयता से चलता है। कार्यक्रम में श्री वल्लभ क्लब के सदस्य, आनंदम सहयोगी और शहर व ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे। वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि परिवारों में संवाद, विश्वास और संस्कारों को फिर से मजबूत बनाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। कार्यक्रम का आभार प्रदर्शन श्रीमती मधु गुप्ता ने किया।
आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल
- जब परिवारों में संवाद खत्म होने और सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव की बात की जा रही है, तो आनंद विभाग इसके समाधान के लिए जमीनी स्तर पर कौन-से ठोस कार्यक्रम चला रहा है?
- क्या केवल परिचर्चाओं और भाषणों से पारिवारिक टूटन रुक पाएगी, या सरकार परिवार परामर्श केंद्रों जैसी स्थायी व्यवस्था भी शुरू करेगी?
- वक्ताओं ने पाश्चात्य संस्कृति और डिजिटल युग को परिवारों में दूरी की वजह बताया, लेकिन क्या बदलती आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियां भी इसके लिए उतनी ही जिम्मेदार नहीं हैं?