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| विंध्य में 'उड़ता पंजाब' जैसे हालात: रीवा-मऊगंज में सुबह के नाश्ते की तरह आम हुआ नशा Aajtak24 News |
रीवा - रीवा संभाग से एक बेहद चिंताजनक और भयावह तस्वीर सामने आ रही है। विंध्य की यह पावन धरा, जो कभी अपनी अनूठी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान के लिए जानी जाती थी, आज धीरे-धीरे नशे के एक ऐसे काले दलदल में तब्दील होती जा रही है जिससे बाहर निकलना अब असंभव सा प्रतीत होने लगा है। प्रदेश के मुखिया और आलाधिकारियों द्वारा नशे के खिलाफ कागजों पर तो भर्षक प्रयास और बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि नशा अब यहां सुबह के 'नाश्ते' की तरह आम हो चुका है, जो समूची युवा पीढ़ी के विनाश का कारण बन रहा है।
जर्जर होती जवानी, अपराध का बढ़ता ग्राफ
रीवा और नवनिर्मित मऊगंज जिले में स्थिति अत्यंत विस्फोटक हो चुकी है। नशीली सिरप, घातक गोलियां, ब्राउन शुगर, अवैध शराब और गांजे के चंगुल में फंसकर यहां की युवा तरुणाई समय से पहले ही वृद्धावस्था की ओर अग्रसर हो रही है। युवाओं के शरीर जर्जर हो रहे हैं और सोचने-समझने की क्षमता खत्म हो रही है। सबसे खतरनाक पहलू यह है कि नशे की लत को पूरा करने के लिए जब पैसों का अभाव होता है, तो ये युवा सीधे अपराध की दलदल में कूद रहे हैं। चोरी, लूटपाट और राहजनी जैसी घटनाएं आम हो चुकी हैं और पूरा ग्रामीण अंचल इस समय भयग्रस्त है। चिंता की बात यह भी है कि अब इस काले कारोबार में महिलाओं की संलिप्तता के मामले भी आए दिन उजागर हो रहे हैं।
१०,००० से अधिक का 'सिंडिकेट' और नाबालिगों का इस्तेमाल
सूत्रों और जमीनी इनपुट के अनुसार, रीवा और मऊगंज जिले में लगभग १०,००० लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस नशा व्यवसाय में सम्मिलित हो चुके हैं। नशा माफियाओं ने इसे एक 'अघोषित रोजगार' का रूप दे दिया है। चौंकाने वाला ट्रेंड यह है कि अब इस धंधे के नेटवर्क को फैलाने के लिए छोटी-छोटी गुमटियों से लेकर नाबालिग बच्चों तक का इस्तेमाल किया जा रहा है। बच्चों को कूरियर और सप्लायर बनाकर पुलिस की आंखों में धूल झोंकने का खेल धड़ल्ले से चल रहा है।
स्वास्थ्य विभाग की 'कुंभकरणी नींद': बिना लाइसेंस बिक रहा मौत का सामान
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा और तीखा सवाल स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर खड़ा होता है। मेडिकल नशे को रोकना सीधे तौर पर स्वास्थ्य विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी है, लेकिन ऐसा लगता है कि ड्रग इंस्पेक्टर और जिम्मेदार अधिकारी गहरी कुंभकरणी निद्रा में सोए हुए हैं। हालात यह हो चुके हैं कि अब रीवा और मऊगंज में जीवन रक्षक या प्रतिबंधित दवाओं को बेचने के लिए किसी वैध ड्रग लाइसेंस की आवश्यकता ही नहीं बची है। अब चाय की दुकानों, पान के टपरों और सब्जी के ठेलों पर सरेआम नशीली गोलियां और कफ सिरप बेची जा रही हैं।
बड़ा सवाल: आखिर ड्रग विभाग और खाद्य एवं औषधि प्रशासन का अमला इस कदर अंधा और बहरा क्यों बना हुआ है? जब भी कोई बड़ी खेप पकड़ी जाती है, तो सिर्फ छोटे सप्लायर पर कार्रवाई करके इतिश्री कर ली जाती है। आज तक उस मूल दवा निर्माता कंपनी (मैन्युफैक्चरर) और संबंधित क्षेत्र के दोषी स्वास्थ्य अधिकारियों पर कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई? यह खामोश संलिप्तता नहीं तो और क्या है?
'कमर तोड़' अभियान का सच: कार्रवाई के नाम पर सिर्फ बढ़ी महंगाई
रीवा संभाग के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा पदस्थापना के दौरान बड़े-बड़े दावे किए गए थे। अवैध शराब की पैकारी और नशा माफियाओं की 'कमर तोड़ने' के लिए विशेष अभियान भी चले। लेकिन इस तथाकथित सख्ती का असर जमीन पर उलटा ही देखने को मिला। ना तो शराब की पैकारी बंद हुई और ना ही नशे की तस्करी। फर्क सिर्फ इतना पड़ा कि जो सामग्रियां पहले कम रेट पर मिलती थीं, वे अब ब्लैक में पांच गुना अधिक दामों पर बिकने लगी हैं:
नशीली सिरप: जो पहले ₹१०० में उपलब्ध थी, वह अब ₹५०० में धड़ल्ले से बेची जा रही है।
नशीली गोलियां: ₹५० का पत्ता अब ₹२०० की मोटी कीमत पर खपाया जा रहा है।
मुनाफा कई गुना बढ़ने के कारण नशा माफिया और ज्यादा आक्रामक, रसूखदार और बेखौफ हो गए हैं।
खाकी की सरपरस्ती: थानों में सजती हैं 'महफिलें'
इस पूरे अवैध कारोबार के फलने-फूलने की सबसे बड़ी वजह पुलिस महकमे के कुछ 'महानुभावों' की संलिप्तता है। हर बीट प्रभारी और उस बीट के आरक्षकों (कांस्टेबलों) की नशा माफियाओं के साथ सांठगांठ की चर्चाएं अब आम जनमानस की जुबान पर हैं। आरोप है कि यही नशा कारोबारी थानों में साठगांठ की महफिलें सजाते हैं, जहां दारू और मुर्गे की पार्टियां आम बात हैं। ऐसा नहीं है कि महकमे में सब एक जैसे हैं; आज भी थानों में ईमानदार अधिकारी और कर्मचारी मौजूद हैं, लेकिन इस मजबूत सिंडिकेट के खौफ और रसूख के कारण वे भी आलाधिकारियों को वास्तविकता बताने से डर रहे हैं। विंध्य की रगों में तैरता यह जहर अब एक सामूहिक विफलता की गवाही दे रहा है।
