रीवा; विंध्य की राजनीति में 'शून्य' होता विपक्ष: सत्ता के 'रिमोट' से चल रहे विपक्षी सूरमा; रीवा-मऊगंज की 70% जनता बेसहारा! Aajtak24 News

रीवा; विंध्य की राजनीति में 'शून्य' होता विपक्ष: सत्ता के 'रिमोट' से चल रहे विपक्षी सूरमा; रीवा-मऊगंज की 70% जनता बेसहारा! Aajtak24 News

रीवा/मऊगंज - विंध्य की धरा, जो कभी अपनी प्रखर वैचारिक क्रांति और कद्दावर विपक्षी नेताओं के लिए जानी जाती थी, आज एक अजीबोगरीब 'राजनैतिक सन्नाटे' के दौर से गुजर रही है। रीवा और नवगठित मऊगंज जिले में सत्ता की हनक इतनी हावी है कि विपक्ष पूरी तरह 'वेंटिलेटर' पर नजर आ रहा है। आलम यह है कि आठ विधानसभा सीटों वाले इस क्षेत्र में विपक्षी दल केवल सोशल मीडिया की पोस्ट और कागजी बयानों तक सिमट कर रह गए हैं।

सत्ता के 'माननीय' और विपक्ष का 'मैनेजमेंट'

राजनैतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि कांग्रेस और बसपा जैसे दलों के स्थानीय क्षत्रप अब जनता की आवाज उठाने के बजाय सत्ताधारी दल के एक ताकतवर नेता के 'रिमोट कंट्रोल' से संचालित हो रहे हैं। आरोप हैं कि आंदोलन की रूपरेखा हो या चुनाव में टिकटों का वितरण, सब कुछ सत्ता के गलियारों में तय हो रहा है। मऊगंज विधानसभा को यदि एक अपवाद मान लिया जाए, तो शेष सात सीटों पर विपक्ष की मौजूदगी नगण्य है। ऐसा प्रतीत होता है कि विपक्षी चेहरे जनता के बीच संघर्ष करने के बजाय सत्ता के संरक्षण में खुद को अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं।

मुद्दों का अंबार, पर नेतृत्व 'मौन'

क्षेत्र में भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अफसरशाही चरम पर है, लेकिन विपक्ष ने रहस्यमयी चुप्पी साध रखी है:

  • अफसरशाही और भ्रष्टाचार: राजस्व से लेकर पुलिस विभाग तक, आम आदमी की सुनवाई बोलियों के आधार पर तय हो रही है।

  • कागजी विकास: पंचायतों में धरातल से गायब निर्माण कार्य और वन विभाग में 'काल्पनिक' वृक्षारोपण जैसे भ्रष्टाचार की मिसालें सामने हैं, फिर भी कोई सड़कों पर उतरने को तैयार नहीं।

  • लचर कानून व्यवस्था: बढ़ते अपराध और कुपोषण जैसे गंभीर मुद्दों पर विपक्ष का 'मौन' लोकतंत्र के लिए घातक संकेत है।

60-70% जनता की बेबसी

चुनावी गणित को देखें तो महज 30 से 40 प्रतिशत वोट पाकर प्रतिनिधि चुन लिए जाते हैं, लेकिन शेष 70 प्रतिशत जनता अपनी आवाज उठाने वाले किसी 'मसीहा' की तलाश में है। सिरमौर, रीवा और त्योंथर जैसे क्षेत्र, जो कभी विपक्षी राजनीति के गढ़ हुआ करते थे, आज नेतृत्व विहीन होकर माथा पीट रहे हैं। विडंबना यह है कि विपक्षी दल बार-बार उन्हीं चेहरों पर दांव लगाते हैं, जिनका जनसंपर्क से ज्यादा सत्ता के 'माननीयों' के इर्द-गिर्द घूमना उनकी प्राथमिकता रहती है।

क्या मरेगा लोकतंत्र?

रीवा और मऊगंज की जनता आज एक ऐसे सक्रिय नेतृत्व को तरस रही है, जो एसी कमरों से बाहर निकलकर घेराव, प्रदर्शन और जेल भरो आंदोलन के जरिए सत्ता को जवाबदेह बना सके। यदि विपक्ष ने अपनी इस 'नगण्य' भूमिका को नहीं बदला, तो विंध्य की यह राजनीतिक शून्यता लोकतंत्र के ताबूत में आखिरी कील साबित होगी।

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