NH-30 पर मौत का सफर: कागजों पर 'ग्रीन कॉरिडोर' और धरातल पर 'खूनी रास्ता'; सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की उड़ रही धज्जियां Aajtak24 News

NH-30 पर मौत का सफर: कागजों पर 'ग्रीन कॉरिडोर' और धरातल पर 'खूनी रास्ता'; सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की उड़ रही धज्जियां Aajtak24 News

रीवा/मऊगंज - देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने बार-बार स्पष्ट किया है कि नेशनल हाईवे पर यातायात सुगम बनाना और नागरिकों के 'जीवन के अधिकार' की रक्षा करना राज्य का प्राथमिक कर्तव्य है। लेकिन रीवा से चाकघाट और मनगवां से हनुमना के बीच फैले नेशनल हाईवे-30 की स्थिति को देखकर ऐसा लगता है कि यहाँ प्रशासन ने न्यायालय के आदेशों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया है। यह हाईवे अब विकास का पर्याय नहीं, बल्कि 'खूनी गलियारा' बन चुका है।

अवैध 'कट' और अधूरी सर्विस रोड: मौत को खुला आमंत्रण

इस हाईवे की सबसे भयानक सच्चाई इसके अवैध रूप से काटे गए डिवाइडर हैं। मनगवां और हनुमना के बीच दर्जनों जगहों पर स्थानीय रसूखदारों और होटल संचालकों ने अपनी सुविधानुसार डिवाइडर उखाड़ दिए हैं। बिना किसी सांकेतिक चिन्ह या रेडियम के ये खुले डिवाइडर रात के अंधेरे में काल बनकर सामने आते हैं। इसके साथ ही, अधूरी सर्विस रोड एक और बड़ा सिरदर्द है। सर्विस रोड न होने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों का धीमा यातायात सीधे मुख्य हाईवे पर चढ़ जाता है, जिससे तेज रफ्तार वाहनों के साथ भीषण टक्कर होना आम बात हो गई है।

राजस्व रिकॉर्ड और हकीकत में 'जमीन-आसमान' का अंतर

खबर की सबसे चौंकाने वाली कड़ी राजस्व विभाग की लापरवाही है। राजस्व अभिलेखों (नक्शा और खसरा) में जो हाईवे दर्ज है, वह धरातल पर पूरी तरह गायब है। तत्कालीन कलेक्टरों ने कई बार आदेश जारी किए कि हाईवे की सीमा का भौतिक सत्यापन किया जाए और अतिक्रमण हटाया जाए, लेकिन 'साहब' के आदेश फाइलों के नीचे दबे रह गए। न तो हाईवे का सीमांकन स्पष्ट है और न ही सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार नक्शा दुरुस्त किया गया है। यह प्रशासनिक सुस्ती सीधे तौर पर भू-माफियाओं और अतिक्रमणकारियों को संरक्षण देने जैसी है।

अवैध पार्किंग: 'राइट ऑफ वे' पर होटलों का कब्जा

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट तौर पर 'राइट ऑफ वे' (Right of Way) को खाली रखने के निर्देश दिए हैं। इसके विपरीत, मनगवां से हनुमना तक हाईवे किनारे स्थित ढाबों और होटलों के सामने ट्रकों और भारी वाहनों की लंबी कतारें लगी रहती हैं। होटल संचालक ग्राहकों को लुभाने के लिए हाईवे की जमीन को अपनी निजी पार्किंग की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। इन खड़े वाहनों के कारण सड़क संकरी हो जाती है और मोड़ पर पीछे से आने वाले वाहन अक्सर हादसे का शिकार हो जाते हैं।

पशुओं का बसेरा और प्रशासनिक संवेदनहीनता

हाईवे पर आवारा पशुओं की समस्या अब जानलेवा स्तर पर पहुँच गई है। रात के समय ये पशु अचानक वाहनों के सामने आ जाते हैं। इससे भी अधिक शर्मनाक यह है कि सड़क पर पड़े मृत पशुओं को घंटों तक नहीं हटाया जाता। कई बार इन मृत पशुओं से टकराकर बाइक सवार अपनी जान गंवा चुके हैं, लेकिन NHAI और स्थानीय नगर परिषद/पंचायतें केवल एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर पल्ला झाड़ लेती हैं।

प्रशासन से तीखे सवाल: जवाबदेही किसकी?

  1. टास्क फोर्स की सुस्ती: कलेक्टर रीवा और मऊगंज बताएं कि 'डिस्ट्रिक्ट हाईवे सेफ्टी टास्क फोर्स' की बैठकें सिर्फ कागजों पर क्यों हो रही हैं? अवैध कट बंद कराने के लिए धरातल पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

  2. सत्यापन में देरी: राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार हाईवे की जमीन का भौतिक सत्यापन करने से प्रशासनिक अमला क्यों कतरा रहा है? क्या इसमें किसी बड़े रसूखदार का हित जुड़ा है?

  3. NHAI की चुप्पी: नेशनल हाईवे अथॉरिटी (NHAI) टोल तो वसूलती है, लेकिन सुरक्षा मानकों और लाइटिंग की व्यवस्था में फेल क्यों है?

पत्रकार की टिप्पणी: न्यायालय ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि प्रशासनिक अक्षमता के कारण होने वाली एक भी मृत्यु 'राज्य की विफलता' मानी जाएगी। रीवा और मऊगंज के कलेक्टरों को अब फाइलें छोड़कर सड़क पर उतरना होगा। जनता अब केवल 'आदेश' नहीं, बल्कि 'कार्रवाई' चाहती है। यदि समय रहते ये खूनी कट बंद नहीं हुए और अतिक्रमण नहीं हटा, तो मासूमों की मौत का सिलसिला यूं ही जारी रहेगा।

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