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| काली पन्नी का 'स्लो पॉइजन': रीवा-मऊगंज में प्रशासनिक दावों की उड़ी धज्जियाँ Aajtak24 News |
मऊगंज - विकास की दौड़ में दौड़ रहे रीवा संभाग और नवगठित मऊगंज जिले में एक ऐसा 'अदृश्य दुश्मन' घर कर गया है, जो धीरे-धीरे हमारी धरती, जल स्रोतों और स्वास्थ्य को खोखला कर रहा है। यह दुश्मन है—प्रतिबंधित काली पन्नी (पॉलिथीन)। शासन के कड़े निर्देशों और पर्यावरण संरक्षण के दावों के बावजूद, रीवा और मऊगंज के बाजारों में काली पन्नी का अवैध साम्राज्य न केवल फल-फूल रहा है, बल्कि अब यह एक गंभीर जनस्वास्थ्य आपातकाल का रूप ले चुका है।
बाजारों में 'काली पन्नी' का काला खेल
सब्जी मंडी हो या फल बाजार, 'काली पन्नी' विक्रेताओं का सबसे पसंदीदा हथियार बन गई है। इसके पीछे एक बड़ा 'धोखाधड़ी' का मनोविज्ञान काम करता है। काली पन्नी अपारदर्शी होती है, जिसके कारण दुकानदार इसके भीतर सड़ा-गला सामान या घटिया दर्जे की सब्जी डालकर ग्राहकों को थमा देते हैं। ग्राहक जब तक घर पहुँचकर पन्नी खोलता है, तब तक वह ठगा जा चुका होता है। यह न केवल उपभोक्ता अधिकारों का हनन है, बल्कि खाद्य सुरक्षा मानकों की भी सरेआम धज्जियाँ उड़ाना है।
होटलों से लेकर ग्रामीण अंचलों तक फैला जहर
पॉलिथीन का यह कहर केवल शहरों तक सीमित नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे होटलों और ढाबों में गर्म खाद्य पदार्थों को प्लास्टिक में पैक करने का चलन खतरनाक स्तर तक बढ़ गया है। विज्ञान कहता है कि जब गर्म भोजन प्लास्टिक के संपर्क में आता है, तो 'बिसफेनॉल-ए' (BPA) जैसे हानिकारक रसायन भोजन में घुल जाते हैं। यही कारण है कि विंध्य क्षेत्र में पाचन तंत्र, कैंसर और हार्मोनल असंतुलन जैसी बीमारियां तेजी से पैर पसार रही हैं।
पर्यावरण का दम घोंटता सिंडिकेट
रीवा की बिछिया और बीहड़ नदियों से लेकर मऊगंज के प्राकृतिक जल स्रोतों तक, हर जगह प्लास्टिक का जाल बिछा है। नगर निगम और नगर परिषदों की ड्रेनेज व्यवस्था पूरी तरह इस कचरे से चोक हो चुकी है। हल्की सी बारिश में सड़कें तालाब बन जाती हैं क्योंकि नालियों में फंसी पन्नी पानी की निकासी रोक देती है। यही पन्नी जब मिट्टी में दबती है, तो जमीन की उपजाऊ शक्ति को खत्म कर देती है और भूजल स्तर को रिचार्ज होने से रोकती है।
बेजुबान पशुओं के लिए 'डेथ वारंट'
सड़कों पर घूमने वाले गोवंश के लिए यह पन्नी काल साबित हो रही है। लोग जूठा खाना पन्नी में बांधकर फेंक देते हैं, जिसे गाय और अन्य पशु पन्नी सहित खा जाते हैं। रीवा और मऊगंज के पशु चिकित्सकों के अनुसार, मृत पशुओं के पोस्टमार्टम में उनके पेट से 20 से 40 किलो तक प्लास्टिक निकल रहा है। यह स्थिति विंध्य की 'गो-सेवा' की संस्कृति पर एक बड़ा कलंक है।
प्रशासनिक तंत्र की 'महीने वाली' खामोशी?
सवाल यह उठता है कि जब सरकार ने सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगा रखा है, तो ये टन के भाव में कहाँ से आ रहा है? स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि नगर निगम, नगर पंचायत और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की टीमें केवल 'दिखावे' के लिए छोटी दुकानों पर कार्रवाई करती हैं, जबकि बड़े थोक विक्रेताओं और सप्लायर्स पर हाथ डालने से बचती हैं। छिटपुट जुर्माने की रस्म अदायगी के बाद अगले ही दिन स्थिति फिर जस की तस हो जाती है।
समाधान की तलाश: नीतियां बनाम हकीकत
सरकार को केवल प्रतिबंध लगाकर शांत नहीं बैठना चाहिए। जब तक कपड़ों के थैलों और जूट के बैग्स को सस्ता और सुलभ नहीं बनाया जाएगा, जनता मजबूरी में पन्नी का उपयोग करती रहेगी। ग्राम पंचायतों और नगर निकायों को 'वेस्ट मैनेजमेंट' के लिए युद्ध स्तर पर काम करने की जरूरत है। रीवा और मऊगंज में काली पन्नी का बढ़ता उपयोग इस बात का प्रमाण है कि हम अपनी अगली पीढ़ी को एक 'बीमार विरासत' सौंपने की ओर बढ़ रहे हैं। यदि आज जिला प्रशासन ने कड़ाई नहीं दिखाई और आम जनता ने अपनी जीवनशैली नहीं बदली, तो विंध्य का यह हरा-भरा अंचल जल्द ही 'प्लास्टिक के रेगिस्तान' में तब्दील हो जाएगा।
